आदिम संस्कृति एवं सांस्कृतिक जैव-विविधता का संरक्षण
देवगुड़ियों का उन्नयन एवं घोटुल निर्माण कार्य बस्तर की आदिम संस्कृति और सांस्कृतिक जैव विविधता यहां के जंगलों और प्रकृति से गहराई से जुड़ी जीवन-पद्धति है। जनजातीय समाज के लिए वन केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और पहचान का आधार हैं। इसीलिए वन संरक्षण के साथ वन-आश्रित सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी वन विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
देवगुड़ी बस्तर में प्रकृति, पूर्वजों और समुदाय के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। पिछले 2.5 वर्षों में रू. 19.05 करोड़ की राशि व्यय कर वन क्षेत्रों में जनजातीय आस्था और वनवासी संस्कृति के प्रतीक 572 देवगुड़ियों का सफलतापूर्वक निर्माण और जीर्णोद्धार किया गया है।
इसी क्रम में बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक संस्था ‘घोटुल’ के संरक्षण की दिशा में भी कार्य किया गया है। ग्राम गढ़बेंगाल में निर्मित घोटुल में पारंपरिक बैठने, युवा कक्ष, नृत्य स्थल तथा वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के लिए व्यवस्थाएं की गई हैं। घोटुल युवाओं को अनुशासन, सहयोग, लोककला, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संस्कार देता है। आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के दौर में इन परंपराओं को जीवंत रखना आवश्यक है। क्योंकि इनके साथ बस्तर का सामुदायिक ज्ञान और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सदियों पुरानी समझ जुड़ी है।
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण से और मजबूत रूप से जोड़ता है। इसलिए देवगुड़ी और घोटुल का संरक्षण केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि संस्कृति, समुदाय और प्रकृति के रिश्ते को सहेजने का प्रयास है। यह पहल बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और उसके पारंपरिक प्रकृति-संरक्षण ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
हरित छत्तीसगढ़ः एक पेड़ माँ के नाम 3.0
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से छत्तीसगढ़ की हरित यात्रा 5 जून 2024, विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण संरक्षण को मातृशक्ति के सम्मान से जोड़ते हुए ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान का शुभारंभ किया। इस अनूठी पहल ने देशभर में पौधारोपण को एक व्यापक जनअभियान का स्वरूप दिया और प्रकृति के प्रति व्यक्तिगत जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया।
छत्तीसगढ़ ने भी इस अभियान को व्यापक जनभागीदारी के साथ आगे बढ़ाया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा पौधारोपण और हरित क्षेत्र के विस्तार की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। निर्धारित लक्ष्यों से आगे बढ़कर किए गए पौधारोपण ने छत्तीसगढ़ की पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता को और मजबूत किया है।
| वर्ष | पौधारोपण लक्ष्य | वास्तविक रोपण / उपलब्धि |
| 2024 (एक पेड़ माँ के नाम) | लक्ष्य: 2.50 करोड़ पौधे | रोपण: 3.50 करोड़ पौधे लक्ष्य से 1.00 करोड़ अधिक 140% उपलब्धि |
| 2025 (एक पेड़ माँ के नाम 2.0) | लक्ष्य: 1.65 करोड़ पौधे | रोपण: 3.55 करोड़ पौधे लक्ष्य से 1.90 करोड़ अधिक 215% उपलब्धि |
| 2026 (एक पेड़ माँ के नाम 3.0) | लक्ष्य: 2.73 करोड़ पौधे | रोपण: 2 करोड़ 23 लाख 65 हजार पौधे अभियान जारी – लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर |
नवा रायपुर – जैव-विविधता पार्क नवा रायपुर के नवागांव (तूता) क्षेत्र में 80.080 हेक्टेयर में विकसित बायोडायवर्सिटी पार्क प्रकृति संरक्षण और शहरी विकास का अनूठा संगम है। झाँझ झील, आई.आई.आई.टी. और पुरखौती मुक्तांगन के बीच स्थित यह क्षेत्र आज प्रमुख प्राकृतिक ऑक्सीजन हब के रूप में विकसित हो चुका है। चार दशक पुराने मिश्रित वन को संरक्षित करते हुए यहाँ नीम, आंवला, बहेड़ा, सागौन, बीजा, साजा और बाँस जैसी प्रजातियाँ पल्लवित हैं। 20 हेक्टेयर में सघन वृक्षारोपण, तालाब, बाँस के पैगोडा और आधुनिक ड्रिप सिंचाई व्यवस्था ने इसकी जैव-विविधता और पर्यावरणीय महत्त्व को और बढ़ाया है। वर्ष 2023 में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ महाभियान के तहत यहाँ 20,000 पौधों का रोपण किया गया जिनकी देखभाल करके आज वृक्ष के रूप में बड़ा किया जा रहा है, ये राज्य सरकार की पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है।
नैसर्गिक पर्यटन विकास भी विरासत भी
ईको-टूरिज्मः प्रकृति भी, प्रगति भी
- राज्य में वन विभाग द्वारा 240 प्राकृतिक पर्यटन केंद्र स्थापित।
- 50 से अधिक प्राकृतिक पर्यटन केंद्र स्वावलंबी।
- वन समितियों हेतु रोजगार एवं आय के साधन।
बुका, सतरेंगा, कोडार, तातामारी एवं घुड़मारास जैसे ईको-पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों के आगमन से स्थानीय स्व-सहायता समूहों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि।
| जिला का नाम | ईको पर्यटन केन्द्र का नाम | प्रस्तावित लक्ष्य (लाख में) | सकल आय (लाख में) |
| बस्तर | लामनी पार्क | 50 | 28.53 |
| सरगुजा | संजय वाटिका | 40 | 40.46 |
| कटघोरा | बुका जलविहार | 35 | 33.57 |
| महासमुंद | कोडार कैम्प | 35 | 32.73 |
| धमतरी | सत्कार सरोवर | 35 | 25.68 |
| कांकेर | दुधावा | 30 | 18.68 |
| सरगुजा | जलजली | 10 | 16.25 |
| सरगुजा | रामगढ़ | 10 | 13.16 |
| नारायणपुर | ईको पार्क वनमंदिर | 10 | 8.21 |
| मनेंद्रगढ़ | गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क | 5 | 3.95 |
| कुल योग :- | ₹2 करोड़ 60 लाख |
कवर्धा सफारी मॉडल: कवर्धा में 35 किलोमीटर लंबा नया सफारी मार्ग विकसित किया गया है। चक्रीय निधि से खरीदे गए 4×4 सफारी वाहनों का संचालन सीधे स्थानीय ईडीसी (EDC – थावरझोल) द्वारा किया जा रहा है।
मोहरेंगा प्रकृति दर्शनः मोहरेंगा प्रकृति दर्शन को प्राकृतिक वन संपदा, वन्यजीव संरक्षण एवं इको-पर्यटन के समन्वित मॉडल के रूप में विकसित किया गया है। जल संरक्षण संरचनाओं, प्रकृति भ्रमण मार्ग, पर्यटक सुविधाओं एवं समृद्ध जैव विविधता से युक्त यह केंद्र पर्यावरण शिक्षा, प्रकृति प्रेम और वन संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता का सशक्त माध्यम बन रहा है।
ठेमली आइलैंड, धमतरीः गंगरेल बांध के शांत जल के बीच स्थित ठेमली आइलैंड छत्तीसगढ़ के ईको-पर्यटन का नया आकर्षण बनकर उभर रहा है। वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन और वन विभाग की पहल से यहाँ प्रकृति संरक्षण के साथ आधुनिक पर्यटन सुविधाओं का विकास किया गया है। ईको-फ्रेंडली विकास, औषधीय पौधों का संरक्षण और स्थानीय रोजगार के अवसर इस पहल की प्रमुख विशेषताएं हैं। ठेमली आइलैंड सतत विकास और प्रकृति संरक्षण के संतुलन का छत्तीसगढ़ मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।
बिलासा ताल वसुंधरा उद्यान बिलासपुर बिलासा ताल वसुंधरा उद्यान आज अपने प्राकृतिक सौंदर्य और रचनात्मक विकास के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यह उद्यान प्रकृति प्रेमियों को सुकून का एक नया अनुभव देता है। यहाँ पारंपरिक और आकर्षक चित्रकारी से सजे रंग-बिरंगे पुल, जलाशय के किनारे बने खूबसूरत हट और कलात्मक इको-फ्रेंडली मार्ग, बच्चों के मनोरंजन के लिए बनाया गया रोमांचक जुरासिक-थीम डायनासोर ज़ोन पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहे हैं।
वन चेतना केन्द्र पटैता बिलासपुर वनमण्डल बिलासपुर के वन परिक्षेत्र कोटा के अंतर्गत वन चेतना केन्द्र पटैता के तहत घोंघा जलाशय में कॉटेज, कैंटीन का निर्माण किया गया है जहाँ पर नौका विहार, कयाकिंग जैसी गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है।
शिशुपाल इको ट्रेल (बूढ़ा डोंगर) महासमुंद जिले के सरायपाली वन परिक्षेत्र स्थित शिशुपाल पर्वत (बूढ़ा डोंगर) प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक धरोहर एवं साहसिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। ₹45 लाख की लागत से विकसित इस इको ट्रेल पर अब तक 22,096 पर्यटक भ्रमण कर चुके हैं, जिससे ₹4.42 लाख का राजस्व अर्जित हुआ है। परियोजना के माध्यम से 832 मानव-दिवस का रोजगार सृजित हुआ तथा 15 स्थानीय लोगों को नियमित आजीविका प्राप्त हुई है। कैंपिंग, नेचर ट्रेल, ट्रैकिंग, 300 मीटर ऊँचा घोड़ाधार जलप्रपात तथा प्राचीन दुर्ग एवं मंदिरों के अवशेष इसे प्रकृति और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनाते हैं।
बस्तर – प्रगति का नया दौर: जनजातीय गौरव वाटिका, जगदलपुर जगदलपुर के कुम्हड़ाकोट में स्थित जनजातीय गौरव वाटिका पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्र के कायाकल्प की एक प्रेरक मिसाल बनकर उभरी है। कभी गंदगी और अतिक्रमण से प्रभावित यह क्षेत्र आज हरियाली, पर्यटन और जनसुविधाओं से सुसज्जित एक आकर्षक प्राकृतिक परिसर का रूप ले चुका है।
- डंपिंग ग्राउंड से प्रकृति के आंगन तकः आरक्षित वनखण्ड के कक्ष क्रमांक 1021 के इस क्षेत्र का कायाकल्प कर यहां लगभग 1,700 मीटर लंबा नेचर ट्रेल, सुंदर तालाब और आईलैंड विकसित किए गए हैं। आगंतुकों के स्वास्थ्य और मनोरंजन के लिए योग चबूतरा, योग शेड और ओपन जिम की सुविधाएं उपलब्ध हैं। वहीं, पांच आकर्षक पैगोड़ा और सुंदर ब्रिज परिसर की प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ाते हैं।
- हरियाली और जैव विविधता पर विशेष ध्यानः वाटिका में औषधीय पौधों, फलदार वृक्षों और बांस की विभिन्न प्रजातियों का रोपण किया गया है। पूरे परिसर को इको-फ्रेंडली और प्लास्टिक फ्री जोन के रूप में विकसित किया गया है, जिससे प्रकृति के साथ जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा मिलता है।
कुम्हाररास जलाशय (दन्तेवाड़ा) : ईको-पर्यटन के साथ स्थानीय युवाओं को रोजगार दन्तेवाड़ा विधानसभा क्षेत्र क्रमांक-88 | वनमंडल दन्तेवाड़ा। वित्तीय वर्ष 2025-26 में आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील लिमिटेड (AM/NS) के सीएसआर मद अंतर्गत वन परिक्षेत्र दन्तेवाड़ा के कुम्हाररास परिसर स्थित जलाशय में ईको-पर्यटन को बढ़ावा देने एवं स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई। कुम्हाररास जलाशय में पर्यटकों के लिए बम्बू राफ्टिंग एवं नौका विहार जैसी गतिविधियों का विकास किया गया है। इस पहल से क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को पर्यटन से जोड़ते हुए स्थानीय समुदाय की आजीविका के नए अवसर सृजित किए जा रहे हैं। प्रमुख उपलब्धियाँ:
- स्वीकृत राशिः ₹1.00 लाख
- व्यय राशिः ₹1.00 लाख
- पर्यटन गतिविधियाँ: बम्बू राफ्टिंग एवं नौका विहार
- स्थानीय लाभार्थीः ग्रामीण बहुउद्देशीय स्व-सहायता समूह के 24 सदस्य
- मुख्य उद्देश्यः ईको-पर्यटन को बढ़ावा देना एवं स्थानीय युवाओं/ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराना
धुड़मारास, बस्तरः आदिवासी संस्कृति और ईको-पर्यटन का अनूठा अनुभव बस्तर जिले का धुड़मारास गांव अपनी समृद्ध धुर्वा आदिवासी संस्कृति, पारंपरिक जीवनशैली और प्राकृतिक परिवेश के साथ छत्तीसगढ़ के प्रमुख ग्रामीण एवं ईको-पर्यटन स्थलों में अपनी पहचान बना रहा है। गांव में 40 परिवार और 215 की आबादी निवास करती है। पर्यटकों को यहां पारंपरिक धुर्वा संस्कृति, हस्तशिल्प, आदिवासी होमस्टे तथा सांस्कृतिक व्याख्या एवं पर्यटन गतिविधियों का अनुभव मिलता है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी से पर्यटन न केवल क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को सामने ला रहा है, बल्कि ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर रहा है। पर्यटन की प्रमुख झलकियांः
- वार्षिक पर्यटक आगमनः 38,391
- पर्यटन से प्रत्यक्ष रोजगारः 40 व्यक्ति
- अप्रत्यक्ष रोजगार: 20 व्यक्ति
- आवास सुविधाः ‘धुर्वाडेरा’ आदिवासी होमस्टे – 5 कमरे
ढोलकल गणेश ट्रेकिंग रूट का शुभारंभ- (फरसपाल क्षेत्र) दन्तेवाड़ा के फरसपाल क्षेत्र से विश्व प्रसिद्ध ढोलकल गणेश ट्रेकिंग रूट का शुभारंभ वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप के मुख्य आतिथ्य में किया गया। ट्रेकिंग मार्ग के विकास से बस्तर में इको-टूरिज्म को नई पहचान मिलेगी तथा स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। वन विभाग द्वारा पर्यटकों की सुरक्षा एवं सुविधाओं के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं। स्थानीय वन प्रबंधन समितियों की सहभागिता से ट्रेक का संचालन किया जा रहा है, जिससे स्थानीय समुदाय को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त होना आरम्भ हो गया है।
तुंगल डैम- (सुकमा) वामपंथ उग्रवाद प्रभावित संवेदनशील जिला सुकमा के मुख्यालय से 4 किलोमीटर की दूरी पर तुंगल डैम के निकट केंद्र सरकार से वित्त पोषित नगर वन विकसित करते हुए आत्म समर्पित महिला नक्सलियों के पुनर्वास का अनूठा उदहारण प्रस्तुत किया जा रहा है। तुंगल इको पर्यटन केंद्र-सुकमा 8 आत्म समर्पित नक्सलियों के द्वारा सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है, जिससे न सिर्फ नियमित आय का सृजन हो रहा है अपितु उनके परिवारों का पुनर्वास भी संभव हो पाया है। तुंगल डैम में स्थानीय जनजातीय युवाओं के द्वारा बोट क्लब का संचालन करते हुए नियमित आय का सृजन नगर वन की अतिरिक्त उपलब्धि है। विगत 1 वर्ष में समूह द्वारा 8.5 लाख रु की आय अर्जित की गयी है।
वन मंदिर दन्तेवाड़ा- (टेकनार रोड): प्रकृति, संस्कृति और पर्यावरण शिक्षा का अनूठा संगम बस्तर की प्राकृतिक समृद्धि और सांस्कृतिक विरासत को एक साथ अनुभव करने का अवसर प्रदान करता है दन्तेवाड़ा का वन मंदिर। दन्तेवाड़ा के टेकनार रोड पर लगभग 18 एकड़ क्षेत्र में विकसित यह आधुनिक प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक उद्यान वन, वन्यजीव, औषधीय वनस्पतियों, स्वास्थ्य, संस्कृति और पर्यावरण शिक्षा को एक ही परिसर में समाहित करता है। वन मंदिर का 15 दिसंबर 2024 को छत्तीसगढ़ के वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री केदार कश्यप ने लोकार्पण किया। प्रकृति के सात अनूठे आयाम:
- आरोग्य वन: औषधीय वनस्पतियों, योग और पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान का परिचय।
- राशि वन: राशियों से जुड़े वृक्ष-पौधों और उनके पारंपरिक महत्व की जानकारी।
- नवग्रह वन: नवग्रहों से संबंधित पौधों के माध्यम से प्रकृति और भारतीय परंपरा का संगम।
- नक्षत्र वन: नक्षत्रों से जुड़े वृक्षों और उनके पारंपरिक महत्व की झलक।
- सप्तऋषि वन: पारंपरिक एवं औषधीय वनस्पतियों से भारतीय ज्ञान परंपरा का परिचय।
- पंचवटी वन: भगवान श्रीराम के वनवास प्रसंगों से जुड़ी प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत।
- रॉक गार्डन: इन्द्रावती नदी के पत्थरों और लौह पत्थरों से बस्तर की प्राकृतिक एवं खनिज संपदा की झलक।
विश्व धरोहरः कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान (यूनेस्को अस्थाई सूची में सम्मिलित – 2025)
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान को वर्ष 2025 में यूनेस्को विश्व धरोहर की अस्थाई सूची (Tentative List) में सम्मिलित किया गया है। यह छत्तीसगढ़ के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और राज्य की जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी संरक्षण की वैश्विक पहचान का प्रमाण है। महत्व एवं विशेषताएँ:
- 200 वर्ग किमी में फैला कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान अपनी गुफाओं, जलप्रपातों एवं समृद्ध जैव-विविधता के लिए प्रसिद्ध है।
- संरक्षण, स्थानीय सहभागिता एवं इको-टूरिज्म के माध्यम से विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने के प्रयास जारी हैं।
इन्द्रावती टायगर रिजर्व: इन्द्रावती टायगर रिजर्व अंतर्गत वन परिक्षेत्र मद्देड़ बफर अंतर्गत इन्द्रवती नदी के तट में स्थित मट्टीमरका परिसर में पर्यटन हेतु संभावनाओं के देखते हुए प्राकृतिक मनोरम स्थल मट्टीमरका में नेचर कैम्प की स्थापना किया जा रहा है। ताकि पर्यटक होमस्टे कर नदी तट पर प्रकृति का आनंद ले सके एवं पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होगी तथा स्थानीय ग्रामिणों में रोजगार का सृजन होगा, जिससें ग्रामिणों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
नक्सलमुक्त क्षेत्रों में वन विकास व रोजगार हेतु संकल्प: 31 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ के नक्सलमुक्त क्षेत्रों में अधोसंरचना, वन विकास और वनवासियों-आदिवासियों के रोजगार सृजन हेतु कैंपा मद से रु. 99.96 करोड़ का अतिरिक्त ए.पी.ओ. 2026-27 स्वीकृति के लिए भेजा गया है। इसमें 339 कार्यालयीन आवासीय भवन, रु. 18.24 करोड़ सुविधा विकास, 106 रपटा-पुलिया, 38 देवगुड़ी, 31 पेट्रोलिंग कैंप, 41 वॉच टावर, 200 मुनारा, 38 हाईटेक बेरियर तथा दन्तेवाड़ा में रु. 16.41 करोड़ जैव विविधता संरक्षण और रु. 2.50 करोड़ वन्यप्राणी प्रबंधन कार्य प्रस्तावित हैं।
कूप विदोहनः वनवर्धक प्रबंधन एवं रोजगार का साधन
बस्तर में सुरक्षा के साथ विकास की नई राह। विगत दो वर्षों में राज्य शासन के प्रयासों से बस्तर अंचल के माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसके परिणामस्वरूप वन विभाग द्वारा अति-संवेदनशील क्षेत्रों में भी वानिकी एवं विदोहन कार्य पुनः प्रारंभ किए जा रहे हैं। इससे वन संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ स्थानीय वनवासियों के लिए रोजगार एवं आजीविका के नए अवसर सृजित हो रहे हैं। 2026-27 में प्रमुख कार्य: दन्तेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, बस्तर, नारायणपुर, कोण्डागांव एवं कांकेर के दूरस्थ वन क्षेत्रों में इमारती लकड़ी एवं बांस विदोहन के कार्य किए जाएंगे।
- इमारती लकड़ी: 195 कूपों में मुख्य कटाई का कार्य | 1,44,527 वृक्ष चिन्हांकित | 59,624.466 घन मी (CMT) इमारती लकड़ी का अनुमानित उत्पादन | लगभग 8.64 लाख मानव-दिवस रोजगार।
- बांस विदोहन: 21 बांस कूप | 8,519.775 नोशनल टन (NT) बांस उत्पादन का लक्ष्य | लगभग 1.23 लाख मानव-दिवस रोजगार | कमर्शियल एवं इंडस्ट्रियल बांस से स्थानीय उद्योगों को कच्चा माल।
दुर्गम अंचलों में संचार एवं जनसुविधा के नए आयाम (PM JANMAN)
- सड़क कनेक्टिविटी: आदिवासी बहुल एवं दूरस्थ बसाहटों को मुख्य मार्गों से जोड़ने के उद्देश्य से PM JANMAN के तहत वन क्षेत्रों में सड़क मार्गों के विकास को गति दी गई। अब तक 28 प्रकरणों में से 20 प्रकरणों में 58.002 हेक्टेयर क्षेत्र एवं 99.995 किमी मार्ग के लिए कार्य अनुमति जारी की गई। वन अधिकार अधिनियम, 2006 की धारा 3(2) के तहत 417 प्रकरणों (लगभग 1,300-1,400 किमी) में ग्राम सभा की अनुशंसा के बाद विपथन अनुमति प्रदान की गई।
- दूरसंचार सुविधाओं का विस्तार: डिजिटल भारत निधि के तहत नक्सल प्रभावित जिलों के दूरस्थ वन क्षेत्रों में दूरसंचार सुविधा मजबूत करने के लिए BSNL के 62 टावरों के आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से 59 टावरों को वन संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम के तहत लगभग 70 दिनों में अनुमति प्रदान की गई।
- वनभूमि विपथन: विद्यालय, अस्पताल, आंगनबाड़ी, सड़क, विद्युत एवं दूरसंचार लाइन, पेयजल, सिंचाई, कौशल विकास एवं सामुदायिक केंद्र सहित 13 प्रकार के विकास कार्यों के लिए वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(2) के तहत कुल 4,583 प्रकरणों में 2,254.607 हेक्टेयर वनभूमि के विपथन की कार्यवाही की गई।
वन्यजीव संरक्षणः बाघों की संख्या में वृद्धि
छत्तीसगढ़ में बाघ संरक्षण के प्रयासों के फलस्वरूप 2022 से 2026 के बीच बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राज्य के प्रमुख टाइगर रिजर्व – अचानकमार, इन्द्रावती, भोरमदेव, गुरु घासीदास और उदंती-सीतानदी में संरक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक संचालित हैं


















