आस्था एवं विश्वास न केवल जीवन का आधार हैं, बल्कि सहृदयता संचारित करने में प्राणवायु की भूमिका भी निभाते हैं। समस्या तब पनपती है, जब अतिरेक प्रभावी होकर इन्हें अंधविश्वास में परिणत कर डाले। यूं भी भारत में ऐसे असामाजिक तत्वों की कोई कमी नहीं, जो बहुधा धर्म-कर्म की आड़ में ही दुष्कृत्य अंजाम देते हैं। इनमें तथाकथित धर्मगुरुओं, तांत्रिकों से लेकर विश्वासघाती जानकार सभी बराबर शामिल हैं। लगभग डेढ़-दो वर्ष पूर्व, नवरात्र की नवमी के दिन जालंधर में भी एक ऐसी ही घटना घटी थी। पूर्व परिचित अधेड़ एक अबोध बच्ची को, परिवार की अनुपस्थिति में कन्या पूजन के बहाने साथ ले गया, जबकि वास्तविक मंशा कुत्सित थी। वह तथा अन्य 2 बच्चियां अपराधी द्वारा दिया पदार्थ खाते ही बेसुध हो गईं।
होश आया तो बंधक की अवस्था में स्वयं को अनजान जगह पर पाया। दोनों बच्चियों समेत उस दुराचारी की रुग्ण मानसिकता का शिकार हो चुकी बच्ची एक दिन अनायास ही मौका पाकर परिजनों से संपर्क न साधती तो संभवत: शातिर अपराधी आते दिनों उन्हें बेच डालता। बच्ची की होशियारी, मीडिया की सक्रियता तथा पुलिस की मुस्तैदी के चलते अपराधी तो पकड़ा गया, मगर उस भरोसे का क्या, जो उस नरपिशाच ने बच्चियों की अस्मत से खिलवाड़ करके हमेशा-हमेशा के लिए चकनाचूर कर डाला? ‘कथित पूजन’ के छलावे में मिले ये जख्म शायद ही मासूम बचपन कभी भूल पाए!
आस्था-विश्वास की आड़ में बच्चियों का शोषण मात्र अत्यंत संवेदनशील तथा चिंताजनक मुद्दा न होकर कानूनन गंभीर अपराध एवं भत्र्सना योग्य सामाजिक बुराई भी है, बावजूद इसके देश में ऐसी घटनाएं अक्सर देखी-सुनी जा सकती हैं। एन.सी.आर.बी. की प्रवृत्ति को लेकर हुए विश्लेषण के मुताबिक, बच्चियों के खिलाफ होने वाले दुष्कर्म तथा यौन शोषण से जुड़े लगभग 96 से 98 प्रतिशत मामलों में आरोपी पीड़ित बच्ची का कोई जानने वाला (पारिवारिक सदस्य अथवा मित्र, रिश्तेदार, पड़ोसी, ऑनलाइन दोस्त) ही होता है। अनजान व्यक्तियों द्वारा अंजाम दिए गए आपराधिक मामले कुल आंकड़ों का केवल 2-3 प्रतिशत ही हैं।
नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की ‘क्राइम इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में बच्चों के विरुद्ध अपराध के कुल 1,87,702 मामले दर्ज किए गए, जोकि 2023 (1,77,335 मामले) के मुकाबले लगभग 5.8 प्रतिशत अधिक हैं। पोक्सो एक्ट के तहत साल 2024 में बच्चों (विशेषकर बच्चियों) के साथ यौन दुष्कर्म से जुड़े 69,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए, जबकि साल 2023 के दौरान यह संख्या 67,694 रही। यानी कुल बाल अपराधों में लगभग 38 से 40 प्रतिशत घटनाएं सीधे तौर पर यौन शोषण तथा दुष्कर्म से जुड़ी थीं। आंकड़ों के मुताबिक, पोक्सो तथा यौन अपराधों का शिकार होने वाले बच्चों में सबसे बड़ी संख्या 16 से 18 वर्षीय किशोरियों की है। हालांकि, 12 साल से कम आयु वर्ग की बच्चियों के साथ भी गंभीर अपराधों के मामले बड़ी संख्या में दर्ज किए गए। इसके अलावा, नाबालिग लड़कियों की लज्जा भंग करने के प्रयास संबंधी 67,890 प्रकरण अलग से दर्ज हुए। संस्कारों का अभाव, नैतिक मूल्यों का क्षरण, बेलगाम सोशल मीडिया के प्रभावाधीन दूषित होती सोच, असामाजिक वातावरण आदि ऐसे अपराधों में बढ़ौतरी के मुख्य कारण हैं। पाखंडी बाबाओं से लेकर परिचितों द्वारा बच्चियों से दुराचार करने के अधिकतर प्रकरण मूलत: अंधविश्वास के ही परिणाम हैं।
कानूनी स्थिति देखें तो भारत में 18 से कम आयु की किसी भी लड़की के साथ किया गया यौन कृत्य दुष्कर्म/यौन हमला माना जाता है, जिसके लिए पोक्सो एक्ट के तहत कड़ी सजा का प्रावधान है। अटूट श्रद्धा व विश्वास के केंद्र माने जाने वाले धर्मस्थलों तथा आश्रमों में बच्चों का शोषण होने पर कानून इसे विश्वासघात के रूप में देखता है, जिससे अपराध की गंभीरता अधिक बढ़ जाती है। मौजूदा हालात में छोटी उम्र से ही बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’ के बारे समझाना अत्यावश्यक है। बच्चों को सुसंस्कारित करने के साथ, आरम्भ से ही यह शिक्षा दी जाए कि परिवार की अनुपस्थिति में अथवा बिना बताए, किसी लालच या बहकावे में आकर परिचित/अपरिचित के साथ अकेले हरगिज न जाएं। चूंकि बच्चों को डराना-धमकाना-फुसलाना आसान होता है, इसलिए घर में ऐसा माहौल सृजित किया जाए, जहां बच्चे बेझिझक हर बात सांझी कर सकें।
ऐसे किसी भी मामले में बजाय चुप्पी साधने के तुरंत शिकायत करना तथा कानूनी कदम उठाना अनिवार्य बन जाता है। गत दिनों दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हुई दुष्कर्म घटनाओं की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘पुलिस को उन गुंडों तथा असामाजिक तत्वों के मन में कानून का डर पैदा करना होगा, जिनमें इस तरह के अपराध करने की प्रवृत्ति है।’’ ऐसा तभी संभव है, जब पुलिस तंत्र का आधुनिकीकरण किया जाए, न्याय-व्यवस्था में अपेक्षित सुधार हो एवं प्रशासनिक खामियां दूर की जाएं। इस विषय में, सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं, बेटियों के प्रति सम्मान, लैंगिक समानता, नैतिक शिक्षा तथा सामाजिक माहौल के मद्देनजर भी व्यापक स्तर पर कार्य होना चाहिए।
जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘दुष्कर्म ऐसा अपराध है, जिसे कोई भी समाज बिल्कुल स्वीकार नहीं कर सकता’’, सुरक्षा बच्चों का अधिकार है एवं इसे हर हाल में सुनिश्चित करना सरकार, न्यायपालिका, पुलिस, समाज का सांझा दायित्व है। आस्था व विश्वास के प्रवाह में बच्चों की सुरक्षा अनदेखी न रह जाए, यह जिम्मेदारी सबसे अधिक परिवार के ही हिस्से आती है।-दीपिका अरोड़ा



















