भोपाल/ग्वालियर: साल 2020 में जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने 22 विधायक समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हुए थे, तब पार्टी नेतृत्व ने कहा था कि सिंधिया समर्थक भाजपा में इस तरह घुल-मिल गए हैं जैसे ‘पानी में शक्कर’। लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है, ग्वालियर-चंबल संभाग की राजनीति में ‘मूल भाजपा बनाम सिंधिया भाजपा’ की खींचतान सतह पर आने लगी है। हालिया कुछ घटनाओं और बयानों ने इस चर्चा को हवा दे दी है कि क्या वाकई भाजपा के भीतर सिंधिया समर्थकों की स्थिति असहज हो रही है?
हालिया विवाद जिन्होंने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी ग्वालियर में कुर्सियां चलना और काले झंडे (सितंबर 2026):
हाल ही में 21 सितंबर 2026 को ग्वालियर के बेला की बावड़ी में कुशवाहा छात्रावास के एक कार्यक्रम के दौरान सिंधिया के मंच पर आते ही भारी हंगामा हुआ। काले झंडे दिखाए जाने के बाद दो गुटों के बीच जमकर लात-घूंसे और कुर्सियां चलीं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह विवाद स्थानीय भाजपा सांसद भारत सिंह कुशवाहा के समर्थकों और सिंधिया गुट के बीच का था, जो प्रोटोकॉल और तवज्जो न मिलने से नाराज थे।
इमर्ती देवी का छलका दर्द:
सिंधिया की सबसे कट्टर समर्थक मानी जाने वाली पूर्व मंत्री इमरती देवी का एक कथित बयान और मंच साझा न करने की जिद इन दिनों चर्चा का विषय है। पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और सिंधिया समर्थकों के बीच समन्वय की कमी को इस बयान से जोड़कर देखा जा रहा है।
स्थानीय निकायों में बगावत (गुना-शिवपुरी):
गुना और शिवपुरी जैसे सिंधिया के मुख्य गढ़ों में भी अंदरूनी असंतोष देखा जा रहा है। गुना नगर पालिका अध्यक्ष (जो सिंधिया समर्थक हैं) के खिलाफ भाजपा के ही कई पार्षद लामबंद हो चुके हैं। यही हाल शिवपुरी में भी देखने को मिल रहा है, जहां अपनों के ही विरोध के कारण सिंधिया समर्थकों को कुर्सी बचाना भारी पड़ रहा है।
कोर कमेटी की बैठकों से दूरी की चर्चा:
भोपाल में होने वाली संगठनात्मक बैठकों में सिंधिया समर्थकों की राय और उनकी मौजूदगी को लेकर लगातार मीडिया में कयासबाजी चलती रहती है कि उन्हें अब वो तवज्जो नहीं मिल रही जो शुरुआत में मिली थी।
दूसरा पहलू: संगठन का मिला बराबर साथ?
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का एक धड़ा यह भी मानता है कि भाजपा ने सिंधिया गुट को हमेशा तवज्जो दी है। हाल ही में घोषित हुई BJP प्रदेश कार्यसमिति में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ-साथ उनके कई खास समर्थकों को महत्वपूर्ण जगह दी गई है, जिसे पार्टी का बड़ा डैमेज कंट्रोल माना गया। सिंधिया खुद केंद्र में एक मजबूत पोर्टफोलियो संभाल रहे हैं और संगठन के कार्यक्रमों में लगातार सक्रिय हैं।
क्या कहती है विपक्ष और सत्ता पक्ष की दलील?
कांग्रेस का तंज: कांग्रेस इस गुटबाजी पर चुटकी लेते हुए कहती है कि सिंधिया समर्थक अब भाजपा में ‘त्रिशंकु’ बन चुके हैं, जहां न तो उन्हें मान-सम्मान मिल रहा है और न ही वह वापस आ सकते हैं।
भाजपा का बचाव: भाजपा नेतृत्व इन बातों को सिरे से खारिज करता है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि भाजपा एक बड़ा परिवार है और लोकतंत्र में कार्यकर्ताओं के बीच छोटे-मोटे मतभेद होना स्वाभाविक है। इसे किसी गुटबाजी या ‘बुरी स्थिति’ के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।



















