मोटापा अब केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य की समस्या नहीं रह गया, बल्कि देशों की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ‘द इकोनॉमिस्ट’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मोटापे से अमीर देशों की जी.डी.पी. को 3 फीसदी तक का नुकसान हो सकता है। भारत में भी बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी और खानपान की आदतों में बदलाव की वजह से अधिक वजन और मोटापे की समस्या बढ़ती जा रही है। इसलिए हमारे यहां भी इसके आॢथक बोझ की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
‘वल्र्ड ओबेसिटी फैडरेशन’ ने भारत सहित अनेक देशों में मोटापे की वजह से पडऩे वाले संभावित आॢथक बोझ का आकलन किया है। इसके मुताबिक भारत पर यह आॢथक बोझ 2030 तक लगभग 81.5 अरब डॉलर (करीब 7 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मोटापे को राष्ट्रीय स्वास्थ्य समस्या मानने का समय आ गया है? और इससे निपटने के लिए सरकारों को किस तरह की तैयारी करनी चाहिए? गौरतलब है कि अर्थशास्त्री 2 प्रकार की लागत जोड़ते हैं। प्रत्यक्ष लागत में जांच, दवाएं, अस्पताल और उपचार से जुड़े खर्च आते हैं। अप्रत्यक्ष लागत में बीमारी के कारण काम से छुट्टी, काम करने के दौरान कम उत्पादकता और समय से पहले मृत्यु के आर्थिक प्रभाव शामिल होते हैं।
अगर भारत की बात करें तो यहां की बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है। ऐसे में मजदूरों या कामगारों के लिए बीमार पडऩे का सीधा मतलब है रोज की कमाई का नुकसान और जेब से होने वाले इलाज का भारी खर्च, जो पूरे परिवार को गरीबी के दुष्चक्र में धकेल देता है। परिवार के किसी सदस्य की बीमारी की देखभाल में लगने वाला समय भी उस परिवार की आॢथक गतिविधियों को प्रभावित करता है। इसका समग्र असर अंतत: देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। मोटापे से होने वाले आॢथक नुकसान में प्रत्यक्ष लागत उतना असर नहीं डालती, जितनी कि अप्रत्यक्ष लागत। मिसाल के तौर पर, वल्र्ड ओबेसिटी फैडरेशन के आकलन के अनुसार साल 2019 में भारत में अधिक वजन और मोटापे से जुड़ी आॢथक लागत करीब 28.95 अरब डॉलर थी, जिसमें 91.9 फीसदी अप्रत्यक्ष लागत थी।
वस्तुत: देश में शहरीकरण बढ़ रहा है और इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसके साथ जो शहरीकरण की व्यवस्था होनी चाहिए थी, वह सही तरीके से नहीं हो पाई है, जिसके कारण नागरिकों के शारीरिक स्वास्थ्य हेतु बुनियादी सुविधाएं सुचारू रूप से नहीं जुटाई जा सकी हैं। जैसे, बच्चों के लिए खेलने के खुले स्थान लगभग खत्म हो चुके हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय और ‘डी.आई.एस.ई.’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 40 फीसदी स्कूलों में खेल के मैदान ही नहीं हैं। पार्कों की जगह कमॢशयल कॉम्प्लैक्सों ने ले ली है। खेलने की जगह न मिलने से बचपन में ही मोटापे का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है। साथ ही शहरों में सुरक्षित फुटपाथ और रोशनी युक्त तथा अपराध मुक्त सार्वजनिक स्थलों का अभाव है।
इस असुरक्षा के चलते महिलाएं आऊटडोर एक्टिविटी करने से कतराती हैं। एन.एफ.एच.एस.-6 के आंकड़ों के अनुसार शहरों में 42.8 फीसदी महिलाएं अधिक वजन या मोटापे का शिकार हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह अनुपात 25.5 फीसदी है। वल्र्ड ओबेसिटी फैडरेशन की रिपोर्ट के अनुसार 2020 में दुनिया की 38 फीसदी आबादी ओवरवेट या मोटापे से ग्रस्त थी, जिसके 2035 तक बढ़कर 51 फीसदी (लगभग 4 अरब लोग) होने का अनुमान है। (25 से अधिक बॉडी मास इंडैक्स वाले व्यक्ति को ‘ओवरवेट’ और 30 से अधिक बॉडी मास इंडैक्स वाले को ‘मोटापे से ग्रस्त’ माना गया है।) रिपोर्ट में मोटापे से जुड़ी 28 बीमारियों के स्वास्थ्य खर्च, उत्पादकता के नुकसान और मृत्यु के प्रभावों को जोड़ा गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2020 में कुल वैश्विक लागत 1.96 ट्रिलियन डॉलर थी, जो 2030 तक बढ़कर 3 ट्रिलियन और 2060 तक 18 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी।
एन.एफ.एच.एस.-6 के अनुसार, भारत में 15-49 वर्ष की महिलाओं में अधिक वजन या मोटापे का संयुक्त अनुपात 30.7 फीसदी और पुरुषों में 27.3 फीसदी है। अगर संख्या में बात करें तो लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 25 वर्ष से अधिक आयु के करीब 18 करोड़ लोग अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त हैं। ‘वल्र्ड ओबेसिटी फैडरेशन’ के अनुसार भारत में 2019 में अधिक वजन-मोटापे की कुल आॢथक लागत 28.95 अरब डॉलर थी। मौजूदा प्रवृत्तियों पर आधारित मॉडल के मुताबिक यह आॢथक लागत 2030 तक 81.5 अरब डॉलर और 2060 तक लगभग 839 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है, जिसके कारण चीन पर 10,108 अरब डॉलर, अमरीका पर 2,622 अरब डॉलर, भारत पर 839 अरब डॉलर, द. कोरिया पर 411 अरब डॉलर और इंडोनेशिया पर 394 अरब डॉलर का आॢथक बोझ होगा।
वस्तुत: भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आॢथक विकास के साथ स्वस्थ और उत्पादक आबादी भी जरूरी है। लेकिन इसमें मोटापा सबसे बड़ी बाधा बन सकता है। इसलिए सरकारों को इस पर होने वाले खर्च को सिर्फ खर्च न समझते हुए भविष्य का निवेश समझना चाहिए। वल्र्ड ओबेसिटी फैडरेशन के अनुसार मोटापे से निपटने की रणनीतियों पर खर्च की जाने वाली राशि कोई ‘लागत’ नहीं, बल्कि एक ‘निवेश’ है। आज रोकथाम पर किया गया निवेश भविष्य में बीमारी का बोझ घटाने और देश की उत्पादकता बढ़ाने में मदद करेगा। ऐसे में मोटापे की रोकथाम के लिए शारीरिक गतिविधियों को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना जरूरी है। अधिक चीनी, नमक और फैटी खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता तथा आक्रामक मार्कीटिंग खानपान की आदतों को प्रभावित करती है। ऐसे में खाद्य पदार्थों के पैकेट पर चेतावनी, बच्चों को टारगेटेड अस्वास्थकर खाद्य विज्ञापनों पर नियंत्रण और स्कूलों में खाद्य सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन करवाना जरूरी है।-ऋषभ मिश्रा



















