जुड़वा बच्चों को देखकर अक्सर लोग हैरान रह जाते हैं. खासकर जब दोनों का चेहरा, कद-काठी और आवाज लगभग एक जैसी हो. कई बार तो परिवार के लोग भी उन्हें पहचानने में गलती कर बैठते हैं. एक जैसे जुड़वा बच्चों की खासियत यह होती है कि उनका DNA भी लगभग समान होता है. इसके बावजूद उनके शरीर की कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जो उन्हें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग बनाती हैं. फिंगरप्रिंट इन्हीं में से एक है.
ऐसे में क्या आपने कभी सोचा है कि जब जुड़वा बच्चों का DNA एक जैसा होता है तो उनके फिंगरप्रिंट अलग-अलग क्यों होते हैं? आखिर ऐसा क्या है, जो एक ही गर्भ में पलने और लगभग एक जैसी जेनेटिक जानकारी रखने वाले बच्चों की उंगलियों के निशानों को अलग बना देता है? दरअसल, इसके पीछे केवल जेनेटिक्स नहीं, बल्कि गर्भ में बच्चे के विकास के दौरान होने वाली कई छोटी-छोटी प्राकृतिक प्रक्रियाएं जिम्मेदार होती हैं.
ऐसे बनते हैं फिंगरप्रिंट
फिंगरप्रिंट यानी उंगलियों के निशान हमारी त्वचा पर बनी बारीक उभरी हुई लकीरों और उनके बीच मौजूद खांचों से तैयार होते हैं. इन्हें Dermatoglyphs कहा जाता है. यही लकीरें हर व्यक्ति की उंगलियों पर एक खास पैटर्न बनाती हैं. आमतौर पर फिंगरप्रिंट के तीन प्रमुख पैटर्न होते हैं. पहला Loop, जिसमें लकीरें घूमकर वापस अपनी दिशा में आती हैं. दूसरा Whorl, जिसमें गोलाकार या चक्र जैसा डिजाइन दिखाई देता है. तीसरा Arch, जिसमें लकीरें पहाड़ी आकार जैसी बनावट तैयार करती हैं. इन पैटर्न का शुरुआती विकास गर्भ में ही शुरू हो जाता है. लगभग तीसरे महीने से उंगलियों पर लकीरें बनने लगती हैं और छठे महीने तक फिंगरप्रिंट काफी हद तक विकसित हो जाते हैं.
जुड़वा बच्चों का DNA एक
एक जैसे जुड़वा बच्चे यानी Identical Twins तब बनते हैं, जब फर्टिलाइज्ड एग शुरुआती विकास के दौरान दो हिस्सों में बंट जाता है. इस वजह से दोनों बच्चों की जेनेटिक जानकारी लगभग समान होती है. यही कारण है कि उनका चेहरा और शारीरिक बनावट काफी मिलती-जुलती होती है, लेकिन गर्भ में दोनों बच्चों का विकास बिल्कुल एक जैसी परिस्थितियों में नहीं होता. उनकी गर्भ में स्थिति, पोषण की उपलब्धता, रक्त प्रवाह और उंगलियों के विकास की गति में मामूली अंतर हो सकता है. यही छोटे-छोटे अंतर त्वचा की लकीरों के बनने के तरीके को प्रभावित करते हैं. नतीजा यह होता है कि दोनों बच्चों के फिंगरप्रिंट अलग-अलग बन जाते हैं.
गर्भ में मौजूद छोटी-छोटी चीजें भी डालती हैं असर
फिंगरप्रिंट बनने की प्रक्रिया में कई प्राकृतिक कारक भूमिका निभाते हैं. इनमें गर्भ में बच्चे की स्थिति, गर्भनाल की लंबाई, पोषक तत्वों की उपलब्धता और उंगलियों के बढ़ने की रफ्तार शामिल हैं. इसके अलावा उंगलियों के आकार और त्वचा की परतों के विकास का समय भी फिंगरप्रिंट की बनावट को प्रभावित करता है. इन प्रक्रियाओं में होने वाला मामूली बदलाव भी लकीरों के डिजाइन को अलग करते हैं.
इसलिए हर इंसान की पहचान अलग होती है
फिंगरप्रिंट की सबसे खास बात यह है कि व्यक्तियों के निशान बिल्कुल एक जैसे नहीं होते हैं. यहां तक कि एक ही व्यक्ति की दसों उंगलियों के निशान भी अलग-अलग होते हैं. इसी खासियत के कारण फिंगरप्रिंट का इस्तेमाल पुलिस जांच, फॉरेंसिक साइंस, मोबाइल फोन अनलॉक करने और बायोमेट्रिक पहचान में किया जाता है. फिंगरप्रिंट गर्भ में विकसित होने के बाद सामान्य परिस्थितियों में जीवनभर लगभग स्थायी रहते हैं.



















