दूरी व्यापार में कभी समस्या नहीं होती बल्कि उससे व्यापार में लाभ ही होता है. व्यापार दो प्रकार से संचालित होता है. पहला स्थान विशेष पर उत्पादित होने वाली वस्तुओं का व्यापार और दूसरा प्रमुख बाजार से दूर व्यापार. पहली प्रकृति वाले व्यापार में कहा जाता है कि किसी एक स्थान में उत्पादित होने वाली वस्तु जितनी दूर जाकर विक्रय होगी, उसके उतने ज्यादा दाम मिलेंगे. हम इसके संदर्भ में प्राचीन सिल्क मार्ग और कोलंबस ट्रेड को याद कर सकते हैं, जो भारत के गर्म मसालों और सिल्क कपड़ों से जुड़े हुए हैं. आज भी ऐसे उत्पाद हैं जो किसी विशेष जगह उत्पादित होते हैं और उसके दूर देशों में अच्छे दाम मिलते हैं. खुद अपने देश में सेब की फसल को लिया जा सकता है. यह कश्मीर में पैदा होता है. ऊंचे दामों में पूरे देश में बेचा जाता है. यहां तक कि मुंबई जैसे नगरों में इसे सफरचंद नाम दिया गया है यानि वह फल जो दूर से सफर कर के पहुंचा है. व्यापार में दूरियों से सिर्फ ट्रांसपोर्ट का खर्चा बढ़ता है. जबकि गैर उत्पादक स्थानों में उसकी उपलब्धता अच्छा दाम दिलाती है. वस्तु की वास्तविक कीमत उत्पादित स्थान पर कितनी है, इसे कोई नहीं जानता है. यही बाजार भाव न जानने की सूचना व्यापार के लिए वरदान साबित होती है. व्यापार में यह भी कहावत चलती है कि मात्र दो से ढाई रुपये प्रतिकिलो के हिसाब में माल पूरे देश में फैलाया जा सकता है.
बाजार से दूरी
दूसरे तरह के व्यापार के बारे में, जिसमें व्यापार बाजार से दूरी पर फलदायी होता है. किसी भी दुकान के सफल होने का कारण वहां आने वाला ग्राहक होता है जो दुकान से माल खरीद कर दुकान को सफल बनाता है. दुकान मुख्य बाजार से जितनी दूर होगी उसके सफल होने की उतनी संभावना होगी. व्यक्ति किसी एक वस्तु के लिए दूर बाजार जा नहीं सकता है. अगर ग्राहक जाएगा तो उसे बाजार पहुंचने और आने में वस्तु की कीमत के अंतर से ज्यादा का खर्च बैठेगा. इसलिए ग्राहक पास की दुकान से दो पैसा अधिक देकर खरीदना चाहेगा.
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