महालक्ष्मी की कृपा हर कोई चाहता है. गृहस्थाश्रम में लक्ष्मी की कृपा सुहागिनों के श्रृंगार से संवरती है. शास्त्रों में सोलह श्रृंगार का वर्णन मिलता है. विवाहिताओं को घरेलु कार्यों में भी इनमें से अधिकांश को बनाए रखना चाहिए. विवाह में कन्या को सभी सोलह श्रृंगार करने की परंपरा है. कन्या को लक्ष्मी का रूप सोलह श्रृंगार के बाद ही माना जाता है. सोलह श्रंगार में मज्जन, चीर, हार, तिलक, अंजन, कुंडल, नथ, केशविन्यास, चोली (कंचुक), नूपुर, अंगराग (सुगंध), कंगन, चरणराग, करधनी, तांबूल एवं अंगूठी आते हैं. इन सभी को धारण कर कन्या वर के घर गृहलक्ष्मी के रूप में पहुंचती है. इन सभी श्रृंगारों में अधिकांश को विवाहिताओं को नियमित करना चाहिए. जो स्त्रियां घर के कामकाज में स्वयं की संवार पर ध्यान नहीं देतीं वहां लक्ष्मीजी का प्रभाव कम होता है. लक्ष्मी जी को सदा स्वच्छता और श्रृंगार प्रिय होता है. आधुनिक दौर में इनका चलन कम अवश्य हुआ है, लेकिन महत्व कम नहीं हुआ है. आधुनिक स्वरूप में इनको धारण करना न केवल लक्ष्मी की प्रसन्नता के आवश्यक है बल्कि घर में शुभता संस्कार और परंपराओं के निर्वहन में सहायक है. श्रृंगार से स्त्री के मनोबल के साथ स्वास्थ्य को भी सामर्थ्य मिलता है. पति की प्रिया बने रहने में श्रृंगार सहायक होता है. जीवनसाथी की प्रसन्नता और खुशी से घर में शांति आती है. शांति सुख समृद्धि की कारक होती है. सोलह श्रृंगार का मात्र सजावट और सौंदर्यबोध का प्रतीक नहीं है. महालक्ष्मी की कृपा से प्राप्त घर परिवार के प्रति आदर का प्रतीक भी होता है.
श्रृंगार अतिप्रिय है विष्णुप्रिया को, सुहागिनों को सदा रहना चाहिए सज संवरकर
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