सूर्यपुत्र शनिदेव की जयंती ज्येष्ठ माह की अमावस्या को है. शनैश्चर जयंती को पिता सूर्य को ग्रहण लगने वाला है. यह ग्रहण भारत में अमान्य होगा. इसका सूतक भी भारतवर्ष में नहीं लगेगा. कंकणाकृति ग्रहण दक्षिण अमेरिका, अंटार्कटिका, दक्षिण पश्चिम अफ्रीका, प्रशांत महासागर एवं आइसलैंड क्षेत्र में दिखाई देगा. सूर्यग्रहण सर्वाधिक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है. इसका निर्माण सूर्य और पृथ्वी के चंद्रमा के आने पर होता है. अर्थात् तीनों एक सीध में होते हैं. सूर्यदेव की चाल से चंद्रमा और पृथ्वी को अपनी गति व्यवस्थित करना होती है. ऐसे में पृथ्वी पर अत्यावश्यक भौगोलिक सुधार होते हैं. कंकणाकृति सूर्यग्रहण से 12 घंटे पहले सूतक लगता है. यह विशेषत: दृश्य क्षेत्र में मान्य होता है. शनिदेव की शनैश्चर जयंती के दिन ग्रहण होना विभिन्न राशियों के लिए भाग्य में आकस्मिक बदलावों का संकेतक है. शनिदेव भाग्यदाता ग्रह हैं. इन दिनों वे सूर्य के प्रभाव से उलटी चाल में हैं. ऐसे ग्रहण का आना शनिदेव के प्रभाव को अत्यधिक बढ़ाने वाला है. ग्रहण के दौरान ऐसे कार्यों से दूरी रखें जिनके कारक शनिदेव हैं. लोहे के सामान और औजारों को न छुएं. ऐसी भूमि क्षेत्र से दूरी रखें जो दलदली हो. भारी मशीनरी से बचाव रखना भी उचित होगा. शनिदेव न्याय के देवता हैं. ग्रहण के दौरान किसी को हानि न पहुंचाएं. ग्रहण के दौरान पाप-पुण्य का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. ऐसे में कोई चूक न करें. शनिदेव और सूर्यदेव के मंत्रों का जाप कर सकते हैं. ग्रहण रात्रिकाल में रहेगा. रात्रि में हल्का भोजन लें. तनावमुक्त अवस्था में शयन पर जोर दें.

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