पूर्वकाल में कौशल प्रदेश के राजा हरिवंत के पुत्र स्वर्णवंत के यशस्वी पुत्र चित्रवंत ने अल्प आयु पुत्र राजकुमार कृपावंत को राजगद्दी सौंपकर तपस्या हेतु सघन वन की ओर निकल पड़े उनका उद्देश्य यह था कि न केवल कौशल प्रदेश अपितु दक्षिण प्रदेशों की सुख समृद्धि हेतु मां गंगा को कौशल प्रदेश की जीवनदायिनी नदी के रूप में प्रवाहित करने का संकल्प लें सिहावा पर्वत की तराई में ध्यान मग्न हो अनेक वर्षों तक मां गंगा की तपस्या की मा गंगा ने उनके तपस्या से प्रसन्न होकर स्नेहिल भाव से कहा मैं तुम्हारी भावनाओं की सराहना करती हूं किंतु विवश हूं पुत्र ! भगवान विष्णु के चरणों से निकलकर त्रिलोचन भगवान आशुतोष की जटा पर बंधी हूं, मात्र एक ही मार्ग मुक्त होने के लिए दो शेष है अत: भगवान नीलकंठ महादेव द्वारा निर्धारित मार्ग गमन ही तो मेरा पाथेय मार्ग है इसी स्थिति की व्यवस्था के कारण मैं कुछ भी तो तुम्हारा प्रिय नहीं कर सकती पुत्र ! पुत्र तुममें तनिक भी तो आत्मलोभ नहीं है, सर्व कल्याण ही तुम्हारा लक्ष्य है। अत: तुम हताश न होकर सदाशिव महादेवजी को संतुष्ट करो। तुम्हारे सर्व मंगल की कामना करती हूं पुत्र! ऐसा कहकर गंगा मैया अंतर्ध्यान हो गई, तब महाराज चित्रवंत ने शिव मंत्र का जाप के साथ कठोर तपस्या की । ओम नम: शिवाय की गूंज से शिवाहा पर्वत के पशु पक्षी ने मार्ग परिवर्तित कर लिया था । इसकी जानकारी मिलने पर वनांचल के वनवासी समूह के समूह उपस्थित होकर अपने आराध्य देव बुढ़ादेव को प्रसन्न करने लग गए थे। अंतत: महाकाल महोदय ने प्रकट होकर कहा पुत्र! चित्रवंत वरदान मांगो। तब राजा चित्रवंत ने प्रसन्न मुद्रा में प्रणाम करके कहा भगवन राजा भागीरथ ने अपने पूर्वज अर्थात महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों के मोक्ष के लिए धरती पर गंगा मैया को प्रकट “कराया था ठीक इसी तरह मैं भी अपनी प्रजा तथा दक्षिण वासियों के जीवन, जल तथा मोक्ष के लिए देवी गंगा का प्राकट्य चाह रहा हूं । यह वचन सुन महादेव जी बोले वत्स तुम्हारा यह विचार लोक कल्याण की कामना है अत: पुत्र चित्रवंत यह पर्वत मेरे नाम के अनुरूप सिहावा के नाम से विख्यात होगा । इसके कुंड से देवी गंगा पूर्व दिशा की ओर चला के नाम से तथा उत्तर कौशल राजधानी के उत्तर सीमा में स्थित विंध्य के नाम से तथा उत्तर कौशल राजधानी के उत्तर सीमा में स्थित विंध्य से स्वर्णरेखा नर्मदा जी के रूप में पश्चिम दिशा में प्रवाहित होगी पुत्र देवी गंगा दक्षिण में मातृत्व की प्रतिमूर्ति की तरह गोदावरी नाम से प्रभावित होगी उत्तर उत्तर में गंगा दक्षिण में गोदावरी पूर्व में चित्रकला तथा पश्चिम में स्वर्ण रेखा नर्मदा आर्यवर्त के चारों दिशाओं में देवी गंगा प्रवाहित होगी यह कह कर भगवान आशुतोष अंतर्ध्यान हो गए। ज्ञात हो कि पूर्व काल में कौशल नरेश राजा भानुवंत के पितामह चित्रवंत की कठिन तपस्या से देवी गंगा सिहावा पर्वत से प्रकट हुआ इसी कारण चित्रोपला नदी के नाम से विख्यात हुआ। जिसे आज महानदी के नाम से जाना जाता है यह उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित होते हुए कांकेर, धमतरी, राजिम, आरंग, सिरपुर होते हुए शिवरीनारायण में पहुंचकर विराट रूप प्रकट करते हुए पूर्व दिशा की ओर चंद्रहासिनी, संबलपुर होते हुए विभिन्न धाराओं में बह कर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। राजेंद्र वर्मा “तोषी”
चित्रवंत की कठिन तपस्या से सिहावा पर्वत से प्रकट हुई देवी गंगा, चित्रोत्पला (महानदी) नदी के नाम से हो रही प्रवाहित
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