हरतालिका पूजा के लिए सबसे पहले काली गीली मिट्टी से अपने हाथों से गूंदकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाएं। प्रदोष काल में पूजा करना काफी शुभफलदायक होती है। सूर्यास्त के बाद मुहूर्त को प्रदोषकाल कहते हैं। इसमें दिन और रात का मिलन होता है। इसे तीजा भी कहा जाता है। महिलाओं के लिए हरतालिका तीज व्रत का विशेष महत्व होता है, जिसमें सुबह से बिना जल ग्रहण किए शाम को प्रदोषकाल में भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा होती है।हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष भाद्रपद शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को सुहागिन महिलाएं हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं। हिंदू धर्म में सभी तरह के व्रत-त्योहार में इस पर्व का विशेष महत्व होता है। इसमें सुहागिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हुए शाम के समय में भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा करती हैं। हरतालिका तीज व्रत में सुहागिन महिलाएं जल ग्रहण नहीं करती हैं। इसमें व्रत के बाद अगले दिन जल ग्रहण करने का विधान है। मान्यता है कि माता पार्वती ने इस दिन भगवान शिव को पति के रूप में कठोर तपस्या के बल पर प्राप्त किया था। यह व्रत सभी कठोर व्रतों में से एक है। आइए जानते है इसमें किन-किन पूजा सामग्रियों का जरूरत होती है।

भगवान गणेश और माता पार्वती की मूर्ति बनाने के लिए काली गीली मिट्टी, शमी के पत्ते, धूतरे का फूल, माला-फूल और फल, बेलपत्र, जनैऊ, वस्त्र,कलावा, बताशे, श्रीफल, चंदन, घी, कुमुम, लकड़ी का पाटा, पूजा का नारियल, श्रृंगार का सारा सामान, गंगाजल, पंजामृत आदि।

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