- चन्द्रभूषण वर्मा
भारत के प्रोजेक्ट चीता को शायद किसी की नजर लग गई है। मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चीतों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है। 27 मार्च 2023 से शुरू चीतों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। 14 जुलाई 2023 तक 4 महीने के भीतर 8 चीते चल बसे। वहीं बुधवार सुबह (02 अगस्त को) यहां एक और चीते ने दम तोड़ दिया है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) असीम श्रीवास्तव ने मादा चीता की मौत की पुष्टि की है। मादा चीता का नाम धात्री था। कूनो नेशनल पार्क की तरफ से इस संबंध में एक बयान जारी किया गया है। बयान में कहा गया कि मादा चीता की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए उसके शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है।
वहीं बयान में आगे कहा गया कि कूनो नेशनल पार्क में रखे गए 14 चीते (7 नर, 6 मादा और एक शावक) स्वस्थ हैं। कूनो वन्यप्राणी चिकित्सक टीम एवं नामीबियाई विशेषज्ञ के द्वारा चीतों का लगातार स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। इससे पहले, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा था कि चीते कूनो नेशनल पार्क में ही रहेंगे। उन्होंने कहा था कि हम अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों समेत विशेषज्ञों के संपर्क में हैं। हमारी टीम वहां का दौरा करेगी। चीतों को शिफ्ट नहीं किया जाएगा और वे कूनो में ही रहेंगे।
आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन के मौके पर 17 सितंबर 2022 को कूनो नेशनल पार्क में पहली बार चीतों को छोड़ा था। इन चीतों को विशेष विमान से नामीबिया से भारत लाया गया था। इसके बाद दूसरे चरण में 18 फरवरी 2023 को दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 12 चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया था। इसके बाद कूनो चीतों से आबाद हो गया है। इस बीच, 27 मार्च 2023 को नामीबिया से लाई गई 5 साल की मादा चीता शासा की मौत हो गई। उसकी मौत के कारण किडनी का संक्रमण बताया गया। जिस दिन सासा की मौत हुई थी, उसी दिन एक खुशखबरी भी मिली थी। 27 मार्च 2023 को नामीबिया से लाई गई चीता ज्वाला ने चार शावकों को जन्म दिया था।
रेडियो कॉलर भी बन रही समस्या
वहीं, कुछ एक्सपर्ट का यह भी मानना है कि चीतों के गले में रेडियो कॉलर लगाया है। इसके जरिए उन्हें ट्रैक किया जाता है। पिछले एक सप्ताह में जिन दो चीतों की मौत हुई है, उनके गर्दन पर संक्रमण के निशान मिले हैं। जानकारों का कहना है कि चीते खुले में रहते हैं। रेडियो कॉलर में पानी या अन्य चीजों की वजह से गीलापन रहता है। इससे संक्रमण का खतरा रहता है। ये भी एक दिक्कत हो सकती है।
गौरतलब है कि भारत में आखिरी बार चीता सन 1947 में मध्य प्रदेश के कोरिया (वर्तमान छत्तीसगढ़) जिले में देखा गया था। इसके बाद इस प्रजाति को सन 1952 में विलुप्त घोषित कर दिया गया। लगातार हो रही चीतों की मौत दुर्भाग्यजनक जरूर है, लेकिन इसे प्रोजेक्ट चीता की असफलता के तौर पर देखना जल्दबाजी होगा।
बुधवार को एक चीते की और मौत हो गई। लेकिन इससे पहले यहां 11 महीने में 8 से ज्यादा चीतों की मौत हो चुकी है। आखिर इसका कारण क्या है? क्या ऐसी वजह है कि लगातार चीते एक के बाद एक मरते जा रहे हैं ? क्या उन्हें यहां का वातावरण रास नहीं आ रहा है, या फिर कोई और वजह है? इन वजहों को तलाशना बहुत जरूरी है। ऐसे में बहुत से लोग भारत के प्रोजेक्ट चीता पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ लोग इसे सरकार की लापरवाही बता रहे हैं, तो कुछ लोग इसे कूनो नेशनल पार्क को चीतों के लिए उपयुक्त स्थान न होना बता रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत सरकार का प्रोजेक्ट चीता खतरे में पड़ गया है?
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