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भारत का अंतरिक्ष संगठन इसरो जल्‍द ही ‘गगनयान’ के जरिये इंसान को स्‍पेस में भेजने की तैयारी कर रहा है. चंद्रयान-3 की सफलता और आदित्य एल-1 के सफल प्रक्षेपण के बाद भारतीय वैज्ञानिक गगनयान के जरिये तीन भारतीय एस्‍ट्रोनॉट्स को पृथ्वी की निचली कक्षा में ले जाएंगे. ये एस्‍ट्रोनॉट्स तय कक्षा में तीन दिन रहेंगे. फिर सुरक्षित वापस धरती पर लौट आएंगे. उन्हें भारतीय क्षेत्र के समुद्र में उतारा जाएगा. अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी ह्यूमन स्‍पेस मिशन की तैयारियों में जुटी है. वहीं, कई निजी कंपनियां भी स्‍पेस टूरिज्‍म की दिशा में काम कर रही हैं.

दुनियाभर से अब तक 600 से ज्‍यादा लोगों को अंतरिक्ष में भेजा जा चुका है. सबसे पहली बार 1961 में सोवियत संघ के एस्‍ट्रोनॉट यूरी गागरिन अंतरिक्ष की यात्रा पर गए थे. बाहरी अंतरिक्ष में उड़ान भरने वाले ज्‍यादातर लोग एस्‍ट्रोनॉट ही थे. इनमें भी ज्‍यादातर एस्‍ट्रोनॉट अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का हिस्सा थे. हालांकि, हाल में कुछ आम लोगों ने भी स्‍पेस टूरिज्‍म के तहत अंतरिक्ष की यात्रा की थी. अब ये सवाल उठना लाजिमी है कि क्‍या अंतरिक्ष की यात्रा पर भेजे गए 600 लोगों में से किसी की स्‍पेस में मौत हुई है? अगर हां, तो उनका शव धरती पर कैसे लाया गया था? क्‍या कोई अंतरिक्ष यात्री ऐसा भी है, जो स्‍पेस में लापता हो गया हो?

क्‍या स्‍पेस में छोड़ देते हैं एस्‍ट्रोनॉट का शव? – स्‍पेस एक्‍सप्‍लोरेशन जबरदस्‍त जोखिम वाला पेशा है. अगर आप अं‍तरिक्ष से जुड़ी घटनाओं में रुचि रखते हैं तो आपने अपोलो-1 प्रशिक्षण दल या स्पेस शटल चैलेंजर जैसी दुर्घटनाओं के बारे में जरूर सुना होगा. बता दें कि अब तक अंतरिक्ष उड़ानों में 188 लोगों की मौत हुई है. हालांकि, 1980 के दशक के बाद से ऐसी दुर्घटनाओं में काफी कमी आ गई है. अब अंतरिक्ष एजेंसियां ​​सेफ्टी प्रोटोकॉल्‍स को सख्‍ती के साथ लागू करने लगी हैं. अब सवाल ये उठता है कि क्‍या किसी अंतरिक्ष यात्री की मौत होने पर उसका शव स्‍पेस में ही छोड़ा गया है? तो इसका जवाब है कि अंतरिक्ष में किसी एस्‍ट्रोनॉट का शव नहीं है.

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