रायपुर। जिले में कुपोषित शिशुओं को चिन्हित कर पोषण पुनर्वास केंद्र के माध्यम से मां को पोष्टिक आहार बनाने और बच्चों को समय समय पर भोजन करवाने की सीख के साथ बच्चे को कुपोषण मुक्त करने का कार्य किया जा रहा है। जिले में संचालित दो पोषण पुनर्वास केंद्रों में गैर कोविड गतिविधियों संचालित किया जा रहा है। पोषण पुनर्वास केंद्र, जिला अस्पताल कालीबाड़ी में किलकारी करते 9 माह के संजय (बदला हुआ नाम) और 2 वर्ष की सुनीता (बदला हुआ नाम) के माता पिता खुश है कि उनके बच्चे खाना खाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। संजय की मां बताती हैं उनका बच्चा कुछ नहीं खाता था, जबरदस्ती खिलाओ तो रोने लगता और कमजोर होता जा रहा था। जब उसका वजन कराया गया तो वजन और आयु के अनुसार उसका वजन सामान्य से कम निकला। 26 अगस्त को जब हम पोषण पुनर्वास केंद्र में आए तब हमारे बच्चे का फिर से वजन लिया गया तब उसका का वजन 5.7 किलोग्राम निकला। नियमित रूप और नियमित अंतराल से मिले पोषण आहार के कारण 3 सितंबर को 5.96 किलोग्राम वजन हो गया है। ऐसी ही कुछ कहानी सुनीता की भी है। बच्ची 2 वर्ष की है लेकिन वजन और ऊंचाई के अनुसार उसका वजन सामान्य से कम है । सुनीता का स्वभाव चिड़चिड़ा और खाना खाने की इच्छा बिल्कुल नहीं होती है। सुनीता की मां बताती है सुनीता को कुछ भी खाने को दो तो नहीं खाती थी। जब हम 26 अगस्त को यहाँ आये तब इसका का वजन 8.2 किलोग्राम था जो अब 3 सितंबर को बढ़कर 8.64 किलोग्राम हो गया है। बच्चों की माताओं ने बताया यहां पर जिस तरह से भोजन दिया जाता है वह भोजन हम घर पर भी बना सकते हैं लेकिन उनको इसकी जानकारी नहीं थी। साथ ही वह लोग यह समझते थे कि बच्चे एक बार में ही पूरा खाना खा लेते हैं लेकिन ऐसा नही है। यहां आकर पता चला बच्चों को नियमित अंतराल से थोड़ा-थोड़ा भोजन खिलाने से बच्चों को लाभ होता है। एक साथ भोजन खिला देने से बच्चा भोजन नहीं पचा पाता है और या तो वह उस भोजन को बाहर निकाल देता है या उसकी तबीयत खराब हो जाती है। डाइटिशियन पूनम कहती हैं एडमिशन के समय बच्चों को हल्की सर्दी और बुखार भी होता है। कुपोषण में अक्सर ऐसी शिकायत हो जाती है। एडमिशन के बाद शिशु का उपचार शुरू किया। उपचारात्मक डाईट एफ-75 और एफ-100 कहलाती है । ज्यादातर उपचारात्मक डाईट एफ-75 से खान-पान कराना शुरू किया जाता। दो से तीन घंटे में थोड़ी-थोड़ी डाइट बच्चे को दी जाती है। इसमें विशेष रुप से खिचड़ी हलवा, दलिया दिया जाता है। साथ ही डिस्चार्ज के समय यह भी ध्यान रखा जाता है एडमिशन के समय और डिस्चार्ज के बीच में कुपोषित बच्चे के वजन में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई या नही हुई है। यदि नहीं हुई होती है तो उसको 1 सप्ताह के लिए और एडमिट रखा जाता है। कभी-कभी एक माह तक भी एडमिट रखा जाता है। ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति (बच्चे की मां) को कार्य क्षतिपूर्ति के रूप में 15 दिन का 150 रुपये प्रतिदिन दिया जाता है। पोषण पुनर्वास केंद्र से डिस्चार्ज होने के पूर्व मां को घर पर बनने वाले पौष्टिक आहार की जानकारी भी विशेष रुप से दी जाती है। साथ ही माता को भी पौष्टिक आहार कैसे बनाया जाए और खाया जाए पर भी बताया जाता है। डाइटिशियन पूनम का कहना है बच्चों की माताओं को पता ही नहीं होता है कि उनका बच्चा कुपोषित है या हो रहा है। आंगनबाड़ी या मितानिन के माध्यम से उनको जानकारी मिलती है कि उनका बच्चा कुपोषित है। हमारे कार्यकर्ता भी बच्चों के खानपान के बारे में बताते हैं। कुपोषित बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रो, मितानिनों या शिशु संरक्षण माह के दौरान चिन्हित और अस्पतालों के माध्यम से चिन्हित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंन्द्र भेजा जाता है। शिशुओं के शारीरिक विकास के थैरेपिक फूड और दूध, खिचड़ी, हलवा दलिया दिया जाता है। यहां विशेंष रूप से चिकित्सकीय देख रेख में नियमित स्वास्थ्य जांच की जाती है। साथ ही कुपोषण का उपचार एवं नि: शुल्क दवाईयां भी दी जाती है। शरीर को लंबे समय तक संतुलित आहार नहीं मिलना कुपोषण कहलाता है। शरीर बीमारियों का शिकार होने लग जाता है। स्त्रियों और बच्चों में यह रोग अधिक देखने को मिलता है । कुपोषित बच्चों को दो प्रकार से नापते हैं। बच्चों को वजन और आयु , वजन और लम्बाई के अनुसार कुपोषण निर्धारित किया जाता है। थकान का रहना, मांसपेशियां मेंढीलापन, चिड़चिड़ापन, बालों में सूखापन,चेहरे पर चमक की कमी होना, शरीर में सूजन, आंखों के चारों तरफ कालापन होना, हाथ पैरों का पतला होना, किसी भी काम करने में मन नालगना, शारीरिक विकास में कमी, नींद का ज्यादा आना कुपोषण के लक्षण है।
कोविड महामारी से बचाने में किया जा रहा दिशा-
कोविड महामारी के दौरान भी खुले हैं पोषण पुनर्वास केंद्र में संक्रमण को रोकने के लिए दिए निर्देश का पालन किया जा रहा है । कुपोषण से ग्रस्त बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण कोरोना महामारी के समय उन्हें देखभाल की अत्यंत आवश्यक है। साथ ही माताओं को कुपोषित बच्चों के खान-पान व साफ-सफाई से संबंधित जरूरी संदेश भी दिए जा रहे है। उचित चिकित्सीय देखरेख को सुनिश्चित करने के निर्देश का पालन भी किया जा रहा हैं। एनएफएचएस-4 (2015-16) के अनुसार रायपुर में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे जो कम वजन वाले हैं (वजन-आयु) शहरी क्षेत्र में 32.4 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र में 39.8 प्रतिशत है वहीं जिले में कुल 37.4प्रतिशत है।

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