नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले कहा है कि कर्ज की किस्तें पूरी होने तक वाहन का मालिक फाइनेंसर ही रहेगा। किस्तों में डिफॉल्ट होने पर यह फाइनेंसर वाहन का कब्जा ले भी सकता है। इसमें कोई अपराध नहीं है।

जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने यह व्यवस्था देते हुए फाइनेंसर की अपील स्वीकार कर ली और उस पर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा लगाया गया जुर्माना रद्द कर दिया। उपभोक्ता अदालतों ने पर्चेजर से वाहन बिना उचित नोटिस के खोंसने पर तथा उसे किस्ते देने का समय न देने पर दो लाख 23 हजार रुपये का हर्जाना अदा करने का आदेश दिया था।

पीठ ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है पर्चेजेर डिफॉल्ट पर था। उसने खुद माना है कि वह सात किस्त ही चुका पाया था। वहीं फाइनेंसर ने गाड़ी को एक साल बाद यानी 12 महीने के बाद कब्जे में लिया। यह सही है कि फाइनेंसर परचेजर एग्रीमेंट में वाहन जब्त करने से पहले नोटिस देने का प्रावधान था। फाइनेंसर इसी प्रावधान को तोड़ने का दोषी है। इसलिए पर 15,000 रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया जाता है।

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