संविदा, दैनिक वेतन भोगी कर्मियों के बाद अब लगभग सभी सरकारी विभागों में आउटसोर्स कर्मियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। बिजली कंपनियां, नगरीय निकायों, आबकारी, श्रम विभाग, अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, स्कूल छात्रावास, सहित लगभग हर विभाग अब आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे है। भर्ती नियम, सेवा शर्ते और काम वेतन मिलने से लगातार इन कर्मचारियों का असंतोष बढ़ता जा रहा है। ये कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर निरंतर धरना-प्रदर्शन करता र

कुल संख्या : छत्तीसगढ़ प्रगतिशील अनियमित कर्मचारी फेडरेशन ने बताया कि क्लास 3 और 4 को मिलाकर कुल 1 लाख से अधिक आउटसोर्स कर्मी 100 से अधिक एजेंसी के माध्यम से विभागों में सेवा दे रहे हैं। फेडरेशन के मुताबिक इन कर्मियों को कोई पीएफ, ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं नहीं हैं जबकि वेतन न्यूनतम मजदूरी से भी कम मिलता है। इस प्रकार प्रदेश युवाओं शोषण सरकार द्वारा किया जा रहा है|

आर्थिक नुकसान: सरकार को हर साल औसतन 276 करोड़ से अधिक राशि का नुकसान हो रहा है| इसे इस प्रकार समझे ; प्रति कर्मचारी मासिक वेतन 10000 पर 1 लाख कर्मचरियों का 12 माह में 1200 करोड़ का भुगतान किया जा रहा है, इस प्रकार 18 प्रतिशत जी एस टी एवं औसत 5 प्रतिशत एजेंसी का सेवा शुल्क पर 276 करोड़ दिया जा रहा है|

श्रम कानून : मज़दूरी संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तें संहिता, 2020 सहित विभिन्न श्रम कानून प्रचलन में है लेकिन सरकार इन कानूनों को नहीं मानती है| श्रम न्यायालय केवल दिखावा के लिए है|

क्या है सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट : सुप्रीम कोर्ट ने जग्गो एवं अन्य बनाम भारत संघ (दिसम्बर 2024), श्रीपाल बनाम नगर निगम, गाजियाबाद (फरवरी 2025), के इस फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्नाटक राज्य बनाम उमा देवी (2006) के निर्णय का उपयोग नियोक्ता द्वारा नियमितीकरण से इनकार करने के लिए नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब कर्मचारी लंबे समय से सेवा में हों । न्यायालय ने दोहराया कि कर्नाटक राज्य बनाम उमा देवी (2006) निर्णय उद्देश्य पिछले दरवाजे से अवेध नियुक्तियों को रोकना था, न कि आवश्यक कार्य करने वाले लंबे समय से सेवारत कर्मचारियों की नियमितीकरण से वंचित करना। इस निर्णय से स्पष्ट होता है कि न्यायालय अनियमित कर्मचारियों के शोषण के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उनके अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है।

मांग : छत्तीसगढ़ प्रगतिशील अनियमित कर्मचारी फेडरेशन छत्तीसगढ़ प्रदेश के शासकीय कार्यालयों में कार्यरत अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण/स्थायीकरण, निकाले गए कर्मचारियों की बहाली, न्यून मानदेय कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन दिए जाने, अंशकालीन कर्मचारियों को पूर्णकालीन करने, आउट सोर्सिंग/ठेका/सेवा प्रदाता/समूह-समिति के माध्यम से नियोजन सिस्टम बंद करने सहित विभिन्न मांगो पर आवेदन निवेदन, आन्दोलन के माध्यम से निरंतर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराता रहा है |

मोदी की गारंटी : छत्तीसगढ़ के लिए मोदी की गारंटी 2023 पत्र के “वचनबद्ध सुशासन” अंतर्गत बिंदु क्र. 2 में एक कमिटी गठित कर कमेटी में अनियमित कर्मचारियों को सम्मिलित करते हुए समीक्षात्मक प्रक्रिया प्रारंभ करने का उल्लेख किया है| लेकिन कमेटी गठन आदेश अनियमित कर्मचारियों का कोई उल्लेख नहीं होने एवं कमिटी में अनियमित संघो के पदाधिकारियों को सम्मिलित नहीं करने से विरोधाभाष है|

वर्तमान स्थिति : ये अनियमित कर्मचारी विगत 20-25 साल से किसी न किसी प्रकार से शासन की जनहितकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका में सतत् रूप से कार्यरत हैं किन्तु विडम्बना ही है कि सरकार इनकी कोई सुध नहीं ले रही है| वर्तमान में इनकी स्थिति मध्यकालीन बन्धुआ मजदूर से भी बदतर है। पारिवारिक जिम्मेदारी, आर्थिक असुरक्षा, बेरोजगारी, प्रशासनिक दबाव के कारण अपने विरुद्ध हो रहे अन्याय को सहने विवश हैं।

प्रदेश के अनियमित कर्मचारी भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा मांगो को अनदेखा करने से आहत एवं आक्रोशित है| अपनी आधिकारों के लिए फेडरेशन दिसम्बर में विशाल आन्दोलन आयोजित करेगा|

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