राजधानी दिल्ली का जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) नफरत, हिंसा और छद्म वामपंथ का ऐसा अड्डा है, जहां छात्रों की युवा पीढिय़ों को, साल-दर-साल, जहरीला और देश-विरोधी बनाया जा रहा है। दुर्भाग्य है कि आतंकवादी अफजल गुरु और उमर खालिद, शरजील इमाम इन छात्रों के ‘आदर्श’ हैं। पाकिस्तान के लिए वे मर्माहत होते हैं और स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अपमान करते हैं। संसद को वे ढकोसला करार देते हैं, लिहाजा अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ भी आंदोलित होते हैं। अब उन्हीं छात्रों की एक जमात देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की कब्र खोदने के नारे लगा रही है। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की कब्र जेएनयू की ‘लाल मिट्टी’ पर, ‘लाल दीवारों’ वाली जमीन पर ही खुदेगी और ये छात्र ‘लाल सलाम’ की हुंकारें भरेंगे। आखिर प्रधानमंत्री की कब्र क्यों खुदेगी? ऐसे ही नारे कांग्रेस नेताओं ने भी लगाए थे। उन अपराधों की नियति क्या हुई? देश आज भी जानना चाहता है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने जेएनयू के छात्रों के साथ क्या अपराध किया है? भारत सरकार करोड़ों रुपए सालाना का अनुदान देकर ऐसे विश्वविद्यालय को संचालित कर रही है, जहां छद्म वामपंथ और देशद्रोही प्रवृत्तियां पलती रही हैं। वामपंथ शेष देश में अप्रासंगिक हो चुका है। उसके कुछ अवशेष बचे हैं, लेकिन छात्रों के एक वर्ग में आज भी यह फैशन के तौर पर जिंदा है। कैसी विडंबना और विरोधाभास है यह? ‘कब्र खुदेगी’ किसी वैचारिक लड़ाई, संघर्ष का भी हिस्सा नहीं है। संविधान हम सभी को अधिकार देता है कि हम प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों, राजनीति और विचारधारा का विरोध कर सकते हैं। आंदोलन छेड़ सकते हैं, लेकिन जिस शख्स को देश के लोकतंत्र ने बहुमत देकर प्रधानमंत्री चुना है और उस प्रधानमंत्री ने एक निर्वाचित सांसद को अपना गृहमंत्री चुना है, उनकी ‘कब्र खुदेगी’ के नारे लगाना, डफली की ताल पर तालियां बजा कर विरोध-प्रदर्शन करना तो ‘लोकतांत्रिक मजाक’ है। यह देश के कार्यकारी प्रमुख को गालियां देना है, लिहाजा यह असंवैधानिक है और अस्वीकार्य भी है। ऐसे ‘लाल-लाल’ छात्रों को विश्वविद्यालय से बर्खास्त कर हमेशा के लिए ‘काली सूची’ में डाल देना चाहिए। उनका शैक्षिक करियर बर्बाद होता है, तो उसकी भी परवाह नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह भडक़ी, उकसाई गई, उच्छृंखल जमात पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालय में नहीं आई है।

वे देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की कब्र इसलिए खोदने के उत्तेजक नारे लगा रहे हैं, क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं दी है। बल्कि उन्हें 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश का ‘केंद्रीय आरोपित’ माना है। वे आगामी एक साल तक जमानत के लिए दोबारा आवेदन भी नहीं कर सकेंगे। दिल्ली दंगों में 53 मासूम मौतें हुई थीं, 581 लोग घायल हुए थे और 1200 से अधिक घर और दुकानें जला दी गईं या तबाह कर दी गई थीं। कोई सामान्य अपराध नहीं था। उमर और शरजील भी जेएनयू की देश-विरोधी जमात के सदस्य रहे हैं। वे उस कन्हैया कुमार के बगलगीर थे, जो आज कांग्रेस में राहुल गांधी के ‘लाड़ले नेता’ हैं। जब आतंकवादी अफजल गुरु को फांसी दी गई, तो उसके कुछ समय बाद, मोदी के प्रधानमंत्री काल में ही, जेएनयू में घोर देशद्रोही नारे लगाए गए थे-‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह…।’ आजादी, आजादी के भी नारे लगाए गए। आखिर किससे चाहिए आजादी? देश तो आजाद है, लिहाजा ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का मौलिक अधिकार भी हासिल है, लेकिन प्रधानमंत्री की ‘कब्र खुदेगी’ किसी भी मायने में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। यह नापाक गाली है और कानून का उल्लंघन भी है, लिहाजा सोमवार रात, 5 जनवरी, जेएनयू परिसर में, साबरमती हॉस्टल के बाहर, ऐसी नारेबाजी करना विश्वविद्यालय की आचार संहिता के भी खिलाफ है। बहरहाल जेएनयू प्रशासन के आग्रह और हुड़दंगियों की पहचान के आधार पर प्राथमिकी तो दर्ज की गई है, लेकिन शेष कार्रवाई पुलिस को करनी है। यह विश्वविद्यालय भारत में दूसरा सबसे उत्कृष्ट शैक्षिक संस्थान है, लेकिन वामपंथ के एक गिरोह ने छात्रों की मानसिकता विद्रूप करने का लगातार काम किया है, नतीजतन भारत के ही युवा, भारत का ही विरोध करते रहे हैं। अब कठोर कार्रवाई अपेक्षित है। इस तरह के नारों से देश कमजोर ही होगा।

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