नांगल (नाथूसर)। मां की ममता जब जीवन बचाने के लिए अपने शरीर का हिस्सा तक दे दे, तब भी अगर मौत जीत जाए तो सवाल सिर्फ किस्मत का नहीं रह जाता, संवेदनाओं का भी हो जाता है। नांगल गांव की संती देवी यादव की कहानी ऐसी ही है, जहां तीन साल में पति, दो बेटे, बहू और सास को खोने के बाद अब वह टूटे हौसले और सूनी आंखों के साथ जीवन से जूझ रही हैं। जिस छोटे बेटे को बचाने के लिए उसने अपनी एक किडनी दी थी, वह भी मंगलवार को दुनिया छोड़ गया।

हंसता-खेलता परिवार यूं उजड़ गया

नांगल गांव निवासी संती देवी यादव पत्नी स्व. छीतर मांडिया का परिवार कभी हंसता-खेलता था। खेती और पशुपालन से गुजर-बसर करने वाला यह साधारण कृषक परिवार तीन साल पहले अचानक आई त्रासदियों के आगे बिखरता चला गया। सबसे पहले घर की जवान बहू की ब्रेन हैमरेज से मौत हो गई। बहू की असमय विदाई का जख्म अभी भरा भी नहीं था कि कुछ ही समय बाद संती देवी के पति को हार्ट अटैक आया और उन्होंने भी दम तोड़ दिया।

बड़े बेटे की भी चली गई जान

पति और बहू की मौत से उबरने की कोशिश कर ही रही थीं कि परिवार पर तीसरा वज्रपात हुआ। उनके बड़े बेटे सांवरमल (45) की भी अचानक ब्रेन हैमरेज से मौत हो गई। एक के बाद एक अपनों को खोने से संती देवी पूरी तरह टूट चुकी थीं।

बेटे को बचाने के लिए मां ने दी किडनी

इसी दौरान छोटे बेटे मुकेश की तबीयत बिगड़ने लगी। जांच में सामने आया कि मुकेश की दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं। मां ने उस समय अपने दुख को किनारे रखकर हौसला दिखाया। बेटे की जान बचाने के लिए उन्होंने अपनी एक किडनी देने का फैसला लिया। सफल किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मुकेश की हालत में सुधार हुआ और संती देवी को लगा कि उन्होंने अपने बेटे को मौत के मुंह से वापस खींच लिया।

एक साल बाद फिर टूटी उम्मीद

इसी बीच संती देवी की वृद्ध सास भी चल बसी। करीब एक साल तक सब ठीक रहा, लेकिन एक माह पहले मुकेश की तबीयत फिर बिगड़ने लगी। तमाम कोशिशों और इलाज के बावजूद मंगलवार को मुकेश (37) ने भी दम तोड़ दिया। जिस बेटे के लिए मां ने अपनी किडनी दी थी, आज वह भी चल गया। उसका यूं चले जाना पूरे गांव को भीतर तक झकझोर दिया। गांव में सन्नाटा पसर गया और हर जुबां पर एक ही सवाल था-इस परिवार के साथ ऐसा क्यों?

बेटे के इलाज और ट्रांसप्लांट में संती देवी अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर चुकी हैं। खेते और पुशपालन ही अब उसकी आजीविका का एकमात्र सहारा है। आर्थिक संकट के साथ-साथ मानसिक पीड़ा ने भी उन्हें अंदर से तोड़ दिया है।

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