बेशक करीब 6800 कंपनियों और लघु उद्योगों ने अपने दफ्तर, कारखाने, ढांचे आदि पश्चिम बंगाल से खत्म किए हैं और महाराष्ट्र, गुजरात में स्थापित किए हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मौजूदा कार्यकाल में ही करीब 2300 कंपनियों ने बंगाल को छोड़ा है। यह औद्योगिक विकास की नकारात्मक स्थिति है, लेकिन इसके समानांतर का यथार्थ यह भी है कि आईटी, सॉफ्टवेयर क्षेत्र में इन्फोसिस सरीखी वैश्विक कंपनी कोलकाता में अपना औद्योगिक तंबू गाड़ रही है। देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूह रिलायंस ने बंगाल में निवेश की घोषणा की है। सीमेंट और सेमीकंडक्टर क्षेत्रों की कंपनियां बंगाल में अपने ढांचे स्थापित कर रही हैं। बेशक 2006-08 के दौर में बंगाल के सिंगूर इलाके में टाटा समूह को ‘नैनो कार’ का संयंत्र उठाना पड़ा और वह गुजरात के साणंद में पुन:स्थापित किया गया। यह राजनीतिक युद्ध का विवाद बना और सर्वोच्च अदालत के दखल से किसानों की करीब 1000 एकड़ जमीन वापस करनी पड़ी। दुर्भाग्य और विडंबना है कि उसमें से करीब 300 एकड़ जमीन पर ही खेती हो पा रही है। ऐसे परिदृश्य में दुष्प्रचार किया जाता रहा है कि पश्चिम बंगाल ‘उद्योगहीन’ राज्य है। यह तथ्यहीन प्रचार है, क्योंकि बंगाल देश की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसकी औसत विकास दर करीब 12 फीसदी है। यह राष्ट्रीय औसत से काफी बेहतर है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बंगाल का योगदान 6.15 फीसदी है। हालांकि यह योगदान कभी 10 फीसदी से अधिक होता था। पश्चिम बंगाल की गिनती गरीब राज्यों में की जाती है, क्योंकि उसकी प्रति व्यक्ति आय 1 लाख रुपए से भी कम है। हालांकि राज्य की जीडीपी 20.31 लाख करोड़ रुपए से अधिक है और 2030 तक 400 अरब अमरीकी डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है। बंगाल में खनिजों के प्रचुर भंडार हैं। चावल, चाय, कपड़ा, जूट, कोयला, लौह और आईटी उद्योगों पर आधारित अर्थव्यवस्था एक मिश्रित, सामाजिक बाजार की अर्थव्यवस्था है। प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल पर ‘महाजंगलराज’ का गंभीर आरोप चस्पा किया है। यह भी जनता को बताया है कि 100 घरों में से औसतन 4 घरों में ही ‘नल का जल’ है, जबकि यह हकीकत नहीं है। प्रधानमंत्री की ‘नल से जल’ योजना की शोधपरक रपट सार्वजनिक की जाए, तो ढेरों छिद्र सामने आएंगे और योजना के भ्रष्ट आचरण की कलई खुलेगी। बहरहाल आज विषय यह नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार, 18 जनवरी को बंगाल में चुनावी शंखनाद की शुरुआत की है और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को विदा करने का आह्वान किया है।

बंगाल में कानून व्यवस्था के निकम्मेपन, सांप्रदायिक तनाव और हिंसा, घुसपैठ, बांग्लादेशी, रोहिंग्या सरीखे अवैध प्रवासियों का संरक्षण तथा वोट बैंक, भ्रष्टाचार आदि के हालात समझ में आते हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी 15 साल पुरानी सत्ता पर ढेरों सवाल किए जा सकते हैं, लेकिन महज चुनावी राजनीति के मद्देनजर उस पर ‘महाजंगलराज’ चस्पा करना दुर्भाग्यपूर्ण है। बंगाल में राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, ‘वंदे मातरम’ जैसे राष्ट्रीय गीत के रचनाकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, नेताजी सुभाष चंद्र बोस से लेकर कालजयी फिल्मकार सत्यजीत रे तक महान हस्तियों की एक लंबी सूची है, जिन्होंने बंगाल की भद्र और कलात्मक संस्कृति को सींचा। उसे महज एक सरकार के क्रियाकलापों के कारण ‘महाजंगलराज’ करार देकर आरोपित करना ‘पाप’ है। चुनाव का मौसम आ गया है, तो राजनीतिक दल कुछ भी आरोप लगाएंगे, लेकिन देश का प्रधानमंत्री ‘महाजंगलराज’ की बात कहे, तो वह सवालिया और अस्वीकार्य होना चाहिए। बंगाल में एक लाख की आबादी पर संज्ञेय अपराध का औसत 83.9 है। बेशक वहां तेजाब के हमलों के अपराध देश में सर्वाधिक हैं। यह दर 27.5 फीसदी है, लेकिन अन्य अपराध उप्र या अन्य राज्यों की तुलना में कम हैं। एक लाख महिला आबादी पर अपराध की दर 71.3 है। यदि अपराध को भी मानदंड माना जाए, तो भी बंगाल को ‘महाजंगलराज’ करार देना अनुचित है। बंगाल में केंद्र सरकार की ‘आयुष्मान’ और अन्य योजनाओं को लागू नहीं किया जाता, तो यह राज्य का विशेषाधिकार है। इस पर राजनीति की जा सकती है, लेकिन यह ‘महाजंगलराज’ का कारक नहीं है। हम कमोबेश प्रधानमंत्री से अपेक्षा करेंगे कि वह इस मुहावरे को छोड़ कर तथ्यों के आधार पर सरकार को घेरें और अपने लिए जनादेश का अनुरोध करें।

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