भारत के प्रधानमंत्री मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप करीब 16 माह के लंबे अरसे के बाद मिले। बेशक हाथ मिलाए गए, लेकिन गर्मजोशी से गले नहीं मिले। न जाने क्यों? इस महामुलाकात के दौरान कई गांठें खुली होंगी, भ्रम टूटे होंगे, धारणाएं बदली होंगी, कई तरह की बर्फ भी पिघली होगी, नतीजतन राष्ट्रपति टं्रप ने ओमान खाड़ी में तीन भारतीय नाविकों की हत्या पर शोक जताया और भविष्य में सभी नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आश्वासन भी दिया। यह द्विपक्षीय मुलाकात फ्रांस में जी-7 सम्मेलन के एक तरफ की गई। राष्ट्रपति टं्रप ने पहली बार ऐसा बयान देकर दुनिया को चौंका दिया कि यदि किसी ने इस शख्स (प्रधानमंत्री मोदी की ओर इशारा कर) पर हमला किया, तो हम भारत की मदद करेंगे। जब तक भारत में प्रधानमंत्री मोदी हैं, तब तक प्रत्येक हमले में अमरीका भारत के साथ खड़ा रहेगा। राष्ट्रपति टं्रप ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भारत में कोई नया नेता होगा, तो फिर उन्हें (टं्रप को) सोचना पड़ेगा। अमरीकी राष्ट्रपति का यह अभिमत तब सामने आया, जब उनसे भारत के साथ रक्षा-सहयोग का सवाल पूछा गया। बेशक भारत और अमरीका रणनीतिक साझेदार देश हैं। दोनों के बीच रक्षा, सुरक्षा, संरक्षा के करार मौजूद हैं। ये करार भावनात्मक भी हैं और मसविदों पर अंकित भी हैं। सबसे अहम उदाहरण ‘क्वाड’ का है, जिसमें भारत और अमरीका के अलावा, जापान और ऑस्टे्रलिया भी शामिल हैं। इन देशों के लिए हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील हैं। करीब 35 फीसदी व्यापार हिंद महासागर के जरिए होता है। वहां चीन भी मौजूद है और कभी-कभार हेकड़ी भी दिखाता है, लिहाजा अमरीका के इस क्षेत्र में अस्तित्व और सक्रियता के लिए तथा चीन की आक्रामकता का जवाब देने के लिए अमरीका को भारत की जरूरत है। और कोई विकल्प ही नहीं है।

संभवत: राष्ट्रपति टं्रप का बयान इसी परिदृश्य और संवेदनशीलता के मद्देनजर आया हो! इसके अलावा, मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान चीन और तुर्किये ने पाकिस्तान की सैन्य मदद की थी, उसके बावजूद भारत की वायुसेना ने पाकिस्तान के एयरबेस और विमानों को मिट्टी-मलबे में तबदील कर दिया था। बहरहाल अब राष्ट्रपति टं्रप ने सार्वजनिक बयान दिया है कि भारत पर किसी भी हमले की सूरत में अमरीका मदद करेगा। यह कूटनीतिक समीकरणों में ऐतिहासिक बदलाव का स्पष्ट संकेत है, क्योंकि भारत पहले सोवियत संघ समर्थक था और अब भी रूस का घनिष्ठ मित्र है, लेकिन अमरीका का घोषित रणनीतिक साझेदार भी है। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति टं्रप को साफ कहा है कि साझेदारी समान और सम्मानजनक होनी चाहिए। कोई भी रिश्ता, संबंध ‘भरोसे’ के बूते ही कामयाब होता है। भारत-अमरीका के रिश्तों में बीते 16 माह के दौरान उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत को ‘डेड इकोनॉमी’ करार दिया है। भारत की तुलना नरक से की है और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ भी थोपा है। वे बयान मानसिकता के किसी झोंके में कहे गए होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि दोनों देश आपस में पूरक हैं। जहां तक रक्षा-सहयोग का संदर्भ है, तो भारत आज रूस से 40 फीसदी हथियार खरीदता है, फ्रांस से करीब 29 फीसदी और इजरायल से 15-16 फीसदी खरीदता है। इस सूची में अमरीका लगभग गायब है, जबकि वह दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा, करीब 42 फीसदी, सप्लायर है। संभवत: यह यथार्थ राष्ट्रपति टं्रप को परेशान करता होगा! शायद इसीलिए भी टं्रप ने रूस से कच्चा तेल खरीदने की इजाजत भारत को दी है। अमरीकी बंदिश बुधवार को समाप्त हो चुकी थी। बहरहाल राष्ट्रपति टं्रप ने भारत के साथ ‘व्यापार समझौते’ की उम्मीद जताई और प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत को ‘सार्थक’ करार दिया। उन्होंने भारत के साथ 19 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के कारोबार की उम्मीद जताई है। भारत करीब 30 फीसदी इलेक्ट्रॉनिक मशीनरी, उपकरण, करीब 10 फीसदी दवाएं और 8 फीसदी से ज्यादा परमाणु रिएक्टर आदि अमरीका को निर्यात करता है। बहरहाल यह शीर्ष मुलाकात तब हुई है, जब शुक्रवार को अमरीका-ईरान में शांति-समझौते पर हस्ताक्षर प्रस्तावित हैं। राष्ट्रपति टं्रप मानते हैं कि विश्व-व्यवस्था में भारत का योगदान अप्रतिम है। वह बार-बार प्रधानमंत्री मोदी को ‘पक्का दोस्त’ कहते रहे और जल्द ही भारत आने की बात भी उन्होंने कही है।

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