अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चोर-डकैत भी हैं। यह सुनकर और निरंतर खबरों को खंगाल कर यह सच सामने आ रहा है कि भगवान राम के प्रति अगाध आस्था के तौर पर मंदिर में जो दान दिया जाता है या चढ़ावा दान में आता है, उसे चोर डकार रहे हैं। राम मंदिर में भी भ्रष्टाचार, घोटाला पनप रहा है। यह सिर्फ आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक-आध्यात्मिक शर्मिन्दगी है। अभी तक जो सामने आया है, उसके मुताबिक ये चोर-डकैत राम मंदिर की भीतरी व्यवस्था के ही अंग हैं। चढ़ावा-चोरी का आरोप 200 करोड़ रुपए का लगाया गया है। यह राजनीतिक आरोप हो सकता है, क्योंकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। विशेष जांच टीम ने अपनी अंतरिम रपट देनी है और इस माह के अंत तक अंतिम रपट भी आ जानी चाहिए, लेकिन चौंकाने और हैरान करने वाली बात यह है कि न तो राम मंदिर के ट्रस्ट ने पुलिस स्टेशन में कोई प्राथमिकी दर्ज कराई और न ही ट्रस्ट के सवालिया, आरोपित महासचिव चंपत राय ने इस्तीफा दिया। चंपत राय बुनियादी और नैतिक रूप से सभी स्थितियों के लिए जिम्मेदार हैं। मंदिर में वीआईपी बन कर विराजमान रहने के लिए ही उनकी नियुक्ति नहीं की गई थी। राम मंदिर में निर्माण समिति के अध्यक्ष के तौर पर नृपेन्द्र मिश्रा भी हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी के प्रधान सचिव होते थे। उन्होंने मुख्यमंत्री के दिशानिर्देश और आशीर्वाद की बात कही है। क्या जांच दल को इनकी दरकार है? कुछ आरोपितों के घरों से लाखों रुपए की नकदी बरामद की गई है। गोबर के ढेर के नीचे भी नकदी छिपा कर रखी गई थी, लेकिन दान-चोरी तो करोड़ों में बताई जा रही है! प्रभु राम हमारे आराध्य हैं, मन-मन में बसे हैं, सदियों बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का सपना साकार हुआ है, तो प्रभु के सानिध्य में ऐसे चोर-डकैत कैसे और कब पैदा हो गए? यह सुरक्षा-व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल है। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीन वरिष्ठ अधिकारियों की विशेष जांच टीम गठित तो कर दी, लेकिन इतने व्यापक अपराध के लिए प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई गई? प्राथमिकी नहीं है, तो जांच टीम किस अपराध, किस चोरी अथवा आरोपों की जांच कर रही है? यह चोरी ‘आर्थिक भीतरघात’ भी है, क्योंकि आरोपित वे बताए जा रहे हैं, जो दान के नोटों की गिनती की रोजाना की प्रक्रिया और ऑडिट से जुड़े रहे हैं। नोटों की गिनती भारतीय स्टेट बैंक के कर्मचारी, मंदिर ट्रस्ट के कर्मचारी, सीसीटीवी की निगरानी में, करते रहे हैं।

क्या मंदिर के भीतर ही एक ‘संगठित गिरोह’ ने आकार ले लिया है? कोई अकेला-दुकेला इतनी बड़ी चोरी-डकैती नहीं कर सकता। बेशक यह चोरी-डकैती ‘महापाप’ है और चोर असहनीय दैहिक और आत्मिक कष्टों को झेलेंगे। कीड़े पड़ेंगे उनमें! बहरहाल 2024-25 में राम मंदिर में कुल 327 करोड़ रुपए का दान या चढ़ावा आया। उसमें से दानपेटियों में ही करीब 153 करोड़ रुपए का दान आस्थावानों ने दिया। औसतन 12.75 करोड़ रुपए दान प्रति माह आया। अर्थात करीब 42 लाख रुपए रोजाना…! यह कोई सामान्य राशि नहीं है। चूंकि जनवरी, 2024 में प्रभु राम की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी। अत्यंत भव्य कार्यक्रम था। कई आंखें डबडबा रही थीं। इस पुण्य अवसर पर देश के प्रधानमंत्री और असंख्य साधु-संत उपस्थित थे। किसी ने ऐसी चोरी-डकैती की कल्पना तक नहीं की थी। यदि इन अढाई सालों में ही 200 करोड़ रुपए की चोरी-डकैती मान लें, तो उस हिसाब से करीब 27 लाख रुपए की हररोज चोरी की गई। राम मंदिर में ऐसा सुरक्षा-तंत्र है, सीसीटीवी की 24 घंटे निगरानी है, नकदी की गिनती, उसे बैंक तक ले जाने और अन्य मूल्यांकन की परतें कई हैं, लिहाजा ऐसी चोरी संभव नहीं लगती, लेकिन पुराने कारसेवक संतोष दुबे और एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने राम जन्मभूमि पुलिस स्टेशन में शिकायतें दर्ज कराई हैं। पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चढ़ावा-चोरी के आरोप लगाए हैं। एक हिंदूवादी नेता रजनीश सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर हस्तक्षेप करने की मांग की है। यकीनन यह बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला है, 2027 के विधानसभा चुनाव का बुनियादी मुद्दा भी बन सकता है। अखिलेश यादव समेत पूरा विपक्ष इस ताक में रहेगा कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा के दावों की पोल खोली जाए। जनता से अपने लिए समर्थन जुटाने की भी अखिलेश की कोशिश रहेगी।

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