लोकतंत्र और दलबदल का एक भद्दा और मजाकनुमा उदाहरण सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने ऐसी पार्टी में विलय की घोषणा की है, जिसका अस्तित्व ही बौना है। पार्टी अज्ञात है। एक क्षेत्रीय दल की भी उसे मान्यता प्राप्त नहीं है। उसका एक भी निर्वाचित विधायक नहीं है। हालांकि उसके दो उम्मीदवारों ने त्रिपुरा विधानसभा का चुनाव लड़ा था और एक निर्दलीय को पार्टी ने समर्थन दिया था। उन तीनों उम्मीदवारों को कुल 1198 वोट मिले थे। जाहिर है कि जमानतें जब्त हुईं, लेकिन अचानक उसी पार्टी के खाते में 20 सांसद हो जाएंगे और वह लोकसभा में भाजपा, कांग्रेस, सपा, द्रमुक के बाद 5वीं बड़ी पार्टी हो जाएगी। कितना हास्यास्पद है? एक भी विधायक नहीं, लोकसभा का चुनाव लड़ा नहीं और 20 सांसद…! यह दलबदल और मौकापरस्ती की पराकाष्ठा और विदू्रप तस्वीर है। क्या यह लोकतंत्र और चुनाव में संभव है? क्या 10वीं अनुसूची के तहत दलबदल निरोधक कानून में इस स्थिति को वैधता दी जानी चाहिए? ये 20 दलबदलू सांसद किसके प्रति जवाबदेह होंगे? इनका निर्वाचन तृणमूल के चुनाव चिह्न पर किया गया था, भाजपा उम्मीदवारों के खिलाफ इन्हें जनादेश दिया गया था, स्पीकर ओम बिरला के फैसले के बाद ये सांसद भारतीय राष्ट्रीय नागरिक पार्टी (एनसीपीआई) के सांसद होंगे और सत्तारूढ़ एनडीए के घटक होंगे। यह पार्टी भी एनडीए की घटक है, न जाने किस आधार पर..? अंतत: इस पार्टी और सांसदों का विलय भाजपा में हो सकता है! यह निश्चित रूप से लोकतंत्र और संविधान का मजाक है।

निश्चित रूप से दलबदल कानून में गहरी दरारें हैं, जिनमें घुस कर इन सांसदों ने अपनी सांसदी बचाने की कोशिश की है। ये भारतीय राजनीति की ‘काली भेड़ें’ हैं, लिहाजा प्रख्यात अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने उचित ही कहा है कि इन सांसदों की सदस्यता बर्खास्त की जाए। ऐसा कदापि नहीं होगा, क्योंकि ये भाजपा-समर्थक सांसद हैं। भाजपा को संसद के भीतर वोटों का जुगाड़ करना है। दरअसल इन दलबदलुओं ने सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ के फैसले की आत्मा ही कुचल दी है। यदि यह मामला सर्वोच्च अदालत में गया, तो न्यायिक पीठ व्याख्या कर सकती है कि दलबदल या पार्टी में विभाजन किन आधारों पर संवैधानिक है? ममता बनर्जी की मूल तृणमूल कांग्रेस ने भी स्पीकर को पत्र लिखा है कि पार्टी अटूट है, लिहाजा नए गुट (बागी) को मान्यता न दी जाए। स्पीकर भी संविधान और कानून विशेषज्ञों की सलाह ले रहे हैं कि 20 बागी सांसदों की वैधता कितनी है? दिवंगत संविधान विशेषज्ञ एवं लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप मानते थे कि स्पीकर के निर्णय भी ‘राजनीतिक’ होते हैं, क्योंकि वह भी किसी पार्टी के सांसद होते हैं, लिहाजा अवचेतन में उस पार्टी के प्रति निष्ठा बनी रहती है। स्पीकर के निर्णय को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन अदालतें भी स्पीकर के फैसले को बहुत कम छेड़ती हैं। विधायिका और न्यायपालिका के समान सम्मान की बात आड़े आ जाती है, लिहाजा स्पीकर के निर्णय कई सालों तक अदालतों में लटके रहते हैं। गोवा के दलबदल का मामला कई साल पुराना है, जिसमें कांग्रेस के 12 विधायकों ने पाला बदल कर भाजपा का पल्लू थामा था। महाराष्ट्र के असली शिवसेना और एनसीपी के मामले भी शीर्ष अदालत में विचाराधीन हैं। बहरहाल मौजूदा संदर्भ में स्पीकर के अंतिम फैसले का इंतजार करना चाहिए। एक बौनी और अज्ञात पार्टी में, बुनियादी रूप से तृणमूल के, 20 सांसदों का विलय भाजपा की ही रणनीति है। यह बंगाल चुनाव से पहले ही तय कर ली गई थी। मकसद है कि लोकसभा में संविधान संशोधन बिलों पर इन सांसदों के वोट भाजपा-एनडीए के पक्ष में आने चाहिए। यदि ये सांसद अलग गुट बनाते या इनका केस अदालत में चला जाता, तो इनके मतों पर रोक लगाई जा सकती थी, लिहाजा एनसीपीआई का रास्ता चुना गया। बागियों के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि वे संसद के मॉनसून सत्र के बाद, ‘असली तृणमूल’ का दावा चुनाव आयोग में ठोकेंगे।

Advertisement Carousel
Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31