भारतीय नेताओं के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि अमरीका जैसे स्वार्थी देश की जी हज़ूरी करने के बजाय भारत की मजबूती के लिए दीर्घकालिक कारगर नीतियां बनाना जरूरी है…
अमरीका स्वयं को लोकतंत्र, मानवाधिकार और सार्वभौमिक स्वाधीनता का सबसे बड़ा अभिरक्षक मानता है। लेकिन इतिहास बार-बार साबित करता है कि व्हाइट हाउस में चेहरे बदलते हैं, मान्यताओं की शब्दावली बदलती है, पर अमेरिकी सत्ता तंत्र की मूल प्रवृत्ति और दिशा लगभग अपरिवर्तित रहती है। गहराई में जाकर देखें तो अमेरिका को एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सुगठित, संगठनात्मक और दीर्घकालिक सिस्टम संचालित करता है। यह सिस्टम राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि मानता है और उन्हीं हितों के आधार पर दोस्त, साझेदार और विरोधी तय करता है। इसे आप यूं भी समझ सकते हैं कि अमेरिका सीधे कब्जा करने के बजाय कई देशों में सैन्य हस्तक्षेप, राजनीतिक प्रभाव, उलटफेर और अप्रत्यक्ष नियंत्रण करता रहा है, जिसमें इराक, ईरान, अफगानिस्तान, वियतनाम, क्यूबा, फिलीपींस, पनामा, डोमिनिकन गणराज्य, यूक्रेन, निकारागुआ और अभी हाल ही में वेनेजुएला की घटनाएं प्रमुख हैं।
इसके अलावा अमेरिका अपनी अल्फाबेट, अमेजन, एप्पल, टेस्ला, मेटा प्लेटफॉम्र्स, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, वॉलमार्ट, कोकाकोला, पेप्सिको और एनवीडिया जैसी 100 से ज्यादा बड़ी कंपनियों के द्वारा भी विश्वभर में व्यापक और प्रभावशाली मौजूदगी रखता है। अमेरिकी लोकतंत्र का ढांचा ‘चेक्स एंड बैलेंस’ की संकल्पना पर आधारित है। राष्ट्रपति कार्यपालिका का प्रमुख अवश्य है, लेकिन कांग्रेस और सुप्रीम कोर्ट उसकी शक्तियों पर निरंतर निगरानी रखते हैं। युद्ध, बजट और अंतरराष्ट्रीय समझौतों जैसे बड़े निर्णय संस्थागत सहमति के बिना संभव नहीं होते। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सत्ता किसी एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित न हो, यही कारण है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद अमेरिकी विदेश नीति की बुनियादी दिशा बनी रहती है। इसके अलावा अमेरिका में एक स्थायी पारम्परिक शक्ति संरचना भी सक्रिय रहती है, जिसे सामान्यत: ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है। पेंटागन, खुफिया एजेंसियां, विदेश मंत्रालय, सैन्य-औद्योगिक लॉबी, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और प्रभावशाली थिंक टैंक, ये सभी मिलकर अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीतियों को आकार देते हैं। राष्ट्रपति आते-जाते रहते हैं, लेकिन यह तंत्र दशकों तक वही रहता है।
अमेरिकी शक्ति का सबसे प्रभावी हथियार उसकी विशाल सेना से अधिक उसका आर्थिक प्रभुत्व है। डॉलर आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल एवं ऊर्जा सौदे, कर्ज और वित्तीय लेन-देन किसी न किसी रूप में डॉलर से जुड़े हैं। आईएमएफ, विश्व बैंक और स्विफ्ट जैसी संस्थाओं पर अमेरिकी प्रभाव उसे यह क्षमता देता है कि वह बिना युद्ध किए किसी देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल सके। इसलिए जब अमेरिका किसी देश को अपने हितों के विरुद्ध पाता है, तो सबसे पहले आर्थिक प्रतिबंधों का सहारा लेता है। व्यापार रोकना, बैंकिंग व्यवस्था से अलग-थलग करना और तकनीकी पाबंदियां लगाना, ये सभी कदम उस देश की आंतरिक स्थिरता को कमजोर करने के लिए उठाए जाते हैं। अमेरिका किसी देश को सीधे दुश्मन घोषित करने के बजाय उसे ‘खतरे’ की श्रेणी में रखता है। फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार, लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को उछालकर नैतिक दबाव बनाया जाता है। यह नैरेटिव इतना प्रभावशाली होता है कि कई देश अमेरिकी रुख के साथ खड़े होने को मजबूर हो जाते हैं। प्रत्यक्ष युद्ध के कड़वे अनुभवों ने अमेरिका को यह सिखाया है कि सीधा सैन्य हस्तक्षेप महंगा, जोखिमपूर्ण और घरेलू राजनीति में अलोकप्रिय हो सकता है। इसलिए उसने प्रॉक्सी युद्ध की नीति को अपनाया है। स्वयं युद्ध में उतरे बिना स्थानीय या क्षेत्रीय शक्तियों को हथियार, धन और कूटनीतिक समर्थन देकर अपने हित साधे जाते हैं। यूक्रेन-रूस संघर्ष इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहां अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से युद्धरत नहीं है, लेकिन पिछले दरवाजे से हथियारों और डॉलर्स की आपूर्ति से उसका प्रभाव स्पष्ट दिखता है। जिसे आप अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा हाल ही में मंजूर किए गए बिल ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2025’ से बेहतर समझ सकते हैं जिसका मकसद उन देशों पर दबाव बनाना है, जो यूक्रेन युद्ध के बीच रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीद रहे हैं। जब किसी देश की सरकार अमेरिकी रणनीतिक हितों को खुली चुनौती देती है, तो सत्ता परिवर्तन की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।
कभी तख्तापलट का समर्थन, कभी विपक्षी ताकतों को खुला या छिपा सहयोग, तो कभी मीडिया और एनजीओ के माध्यम से जनमत को प्रभावित करने का प्रयास, ये सभी उसी रणनीति के हिस्से हैं। जब तक अमेरिकी सत्ता तंत्र का मूल स्वभाव नहीं बदलता, तब तक राष्ट्रपति कोई भी हो, दुनिया को उसी रणनीति का सामना करना पड़ेगा, एक ऐसी रणनीति जो शक्ति, दबाव और नियंत्रण पर आधारित है। इस विश्लेषण के आलोक में यह अनिवार्य हो जाता है कि भारतीय शासनतंत्र और हमारे नीति निर्माता सशक्त, समृद्ध और शक्तिशाली भारत के निर्माण के लिए अपने नागरिकों के लिए मुफ्त में बांटो वाली योजनाएं बनाने के बजाय स्वदेशी टेक्नोलॉजी पर आधारित सुदृढ़ रक्षातंत्र, स्वतंत्र विदेश नीति और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए नीतियां बनाएं ताकि भारत के दीर्घकालिक हित सुरक्षित हों।
राजा भर्तृहरि के प्रसिद्ध ग्रंथ नीतिशतकम् का यह कथन ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ हमें आगाह करता है कि हमें हमेशा अपनी सुरक्षा को सर्वोपरि रखना चाहिए। इतना ही नहीं, भारत सरकार के मुख्य रणनीतिकारों को चाहिए कि वे हमारे प्राचीन शास्त्रों में उल्लिखित चार प्रकार की नीतियों- साम, दाम, दंड, भेद के अतिरिक्त चाणक्य नीति, विदुर नीति, भीष्म नीति, मनु नीति (मनुस्मृति), शुक्र नीति, बृहस्पति नीति और गर्ग नीतियों जैसे प्रमुख ग्रंथों जिनमें शासन, युद्ध, अर्थ, धर्म और व्यक्तिगत जीवन के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन मिलता है, का बृहद विश्लेषण करें और उनमें से कारगर विचारों को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाएं। भारतीय नेताओं के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि अमेरिका जैसे स्वार्थी देश की जी हज़ूरी करने के बजाय भारत की मजबूती के लिए दीर्घकालिक कारगर नीतियां बनाना जरूरी है, क्योंकि वैश्विक राजनीति आदर्शों से नहीं, अपने हितों के संरक्षण से संचालित होती है।-अनुज आचार्य














