यदि सनातन का राग अलापने वालों की सरकार में, सनातन के शिरोमणि शंकराचार्य को अपमानित किया गया है, तो सनातन कैसे सुरक्षित और सम्मानित माना जा सकता है? हम सीधे प्रधानमंत्री मोदी या उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सवालों के कटघरे में खड़ा नहीं कर रहे हैं, लेकिन क्या उप्र का औसत प्रशासन इतना खुदमुख्तार हो गया है कि उसने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य को नोटिस भेजकर कहा है कि आप साबित करें, आप शंकराचार्य हैं! क्या देश की सत्ताएं, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा राजनीतिक नेतृत्व अब तय करेंगे कि शंकराचार्य कौन होगा या किसे शंकराचार्य के पद से खारिज किया जाए? मुद्दा बेहद सामान्य है, लेकिन उप्र के प्रशासन और पुलिस ने उसे ‘राई का पहाड़’ बना दिया है। इससे पहले प्रयागराज संगम पर महाकुंभ का आयोजन भी किया गया था, जिसमें दुनिया भर से करीब 66 करोड़ श्रद्धालुओं ने आकर मां गंगा के संगम में स्नान किया, लेकिन प्रोटोकॉल के नाम पर कोई बखेड़ा नहीं हुआ। शंकराचार्य सनातन धर्म के सर्वोच्च संतों में गिने जाते हैं। वे 8वीं सदी के आदि शंकराचार्य की परंपरा ही माने जाते रहे हैं। आदि शंकराचार्य महान भारतीय दार्शनिक और धर्मगुरु थे, जिन्होंने अद्वैत दर्शन को स्थापित किया। हिंदू धर्म को एकीकृत किया और भारत के चार कोनों में चार मठ स्थापित किए। उन्हें पीठ भी कहा जाता है। शंकराचार्य को ईश्वर के बाद सर्वोच्च स्थान और दर्जा भी दिया गया है। बौना-सा सरकारी प्रशासन कौन होता है किसी शंकराचार्य पर सवाल करने और नोटिस भेजने वाला? ‘ज्योतिर्मठ’ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का अभिषेक उनके धर्मगुरु, द्वारका और शारदा पीठों के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने किया था। हालांकि उन्होंने अपने जीवन-काल में अविमुक्तेश्वरानंद को, शंकराचार्य के तौर पर, उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था, लिहाजा मामला सर्वोच्च अदालत में है और अदालत ने फिलहाल किसी अन्य को पदासीन करने पर रोक लगा रखी है। यथास्थिति के मद्देनजर अविमुक्तेश्वरानंद ही शंकराचार्य माने जाते रहे हैं। इस कांड से पहले तक सनातन के जुमलेबाजों को भी आपत्ति नहीं थी। शंकराचार्य की शृंखला में स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ‘गोवर्धन मठ, पुरी’, स्वामी भारती तीर्थ ‘शृंगेरी पीठ’ और स्वामी सदानंद ‘द्वारका पीठ’ के घोषित और पदासीन शंकराचार्य हैं।
क्या कोई प्रशासन अथवा सरकार इन शंकराचार्यों को नोटिस भेज कर साबित करने का आदेश दे सकती है? यदि धर्म, साधु-संतों, परंपराओं को अपमानित करना है, तो सरकारें कुछ भी कर सकती हैं। वे औसत माता-पिता को नोटिस भेजकर सबूत मांग सकती हैं कि वे ही अमुक बच्चे के जैविक जन्मदाता हैं। संविधान की आड़ में प्रशासन, सरकारों को कई उच्छृंखलताओं के विशेषाधिकार प्राप्त हैं। हम भी मानते हैं कि ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य का मामला विवादित है और अदालत के विचाराधीन है, लेकिन साधु-संतों, धार्मिक संस्थाओं, धार्मिक अखाड़ों और श्रद्धालुओं के एक वर्ग को उनके शंकराचार्य होने पर आपत्ति नहीं है, तो उप्र प्रशासन की औकात क्या है? क्या शंकराचार्य नियुक्त करने या बेदखल करने का अधिकार भी संविधान में है? हमें सर्वोच्च अदालत के फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। मुद्दा यह था कि शंकराचार्य माघ मेले का संगम में स्नान करने जा रहे थे। वह अपनी परंपरागत पालकी और रथ पर सवार थे और शिष्यों का काफिला भी उनके साथ था। मेला क्षेत्र, प्राधिकरण के बड़े अफसर, शीर्ष पुलिस अधिकारी शंकराचार्य को संगम क्षेत्र में आने से पूर्व ही व्यवस्था को ‘ब्रीफ’ कर सकते थे। यह प्रोटोकॉल और शंकराचार्य होने के सबूत के सवाल कहां से उठे? आखिर पवित्र संगम स्थल के करीब ही धक्कामुक्की की नौबत क्यों आई? शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को वहीं जमीन पर धरना क्यों देना पड़ा? शंकराचार्य के दुस्साहस और हठधर्मिता सरीखे शब्दों का इस्तेमाल क्यों करना पड़ा? इन्हीं शंकराचार्य को अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के समारोह में क्यों आमंत्रित किया गया था? वह सरकार के आलोचक रहे हैं और गौ रक्षा के पैरोकार हैं, उनके बनारस में 150 मंदिर तोड़े जाने के आरोप भी बेहद संवेदनशील और गंभीर हैं, क्या ऐसे ही कारणों के मद्देनजर भाजपा सरकार के अघोषित, अदृश्य आदेशों के तहत शंकराचार्य को नोटिस भेजा गया? योगी सरकार को भी इन सवालों के सार्वजनिक जवाब देने होंगे, क्योंकि यह मुद्दा ‘राजनीतिक द्वन्द्व’ का बन गया है।














