अहमदाबाद: गुजरात के अहमदाबाद में एक क्लेरिकल गलती की वजह से निसंतान दंपती के जीवन में भूचाल ला दिया। इस दंपती को 13 साल तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़े। मामला तब सामने आया जब नगर निगम के जन्म-मृत्यु विभाग के रिकॉर्ड में दंपती के भतीजे को उनका जैविक पुत्र दर्शाया दिया। करीब तीन दशक पुराने इस रिकॉर्ड को पिछले सप्ताह सिटी सिविल कोर्ट ने अवैध करार देते हुए सुधार का आदेश दिया। सिटी सिविल कोर्ट के न्यायाधीश पी. एन. नवीन ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि जन्म प्रमाण पत्र में दंपती के नाम माता-पिता के कॉलम में गलत तरीके से दर्ज किए गए थे, जबकि वे बच्चे के वास्तविक माता-पिता नहीं हैं। अदालत ने नगर निगम को निर्देश दिया कि रिकॉर्ड में आवश्यक संशोधन किया जाए।
13 साल से चल रहा था केस
यह मामला 21 सितंबर 2012 को उस समय सामने आया जब दंपती अहमदाबाद नगर निगम के जन्म और मृत्यु विभाग में किसी कार्य से पहुंचे। वहीं उन्हें पता चला कि जिस युवक की उम्र अब लगभग 30 वर्ष है, उसे सरकारी रिकॉर्ड में उनका पुत्र बताया गया है। दंपती ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने कभी कोई संतान नहीं पैदा की और न ही किसी बच्चे को गोद लिया। उनके अनुसार, यह एंट्री उनकी जानकारी और सहमति के बिना की गई थी। बाद में यह सामने आया कि उक्त युवक वास्तव में उनके बड़े भाई और उसकी पत्नी का जैविक पुत्र है। मामला सिर्फ दस्तावेजी गलती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें संपत्ति हड़पने के आरोप भी जुड़ गए।
दंपती का कोई वारिस नहीं
दंपती का कहना था कि उनके कोई वारिस नहीं हैं, इसलिए दुर्भावनापूर्ण मंशा से यह गलत प्रविष्टि कराई गई ताकि भविष्य में उनकी संपत्ति पर दावा किया जा सके। कोर्ट में दंपती ने यह भी बताया कि युवक के जैविक माता-पिता ने उन पर बच्चे को गोद लेने का दबाव बनाया था। जब उन्होंने इनकार किया, तो पारिवारिक विवाद बढ़ गया और मामला कानूनी लड़ाई में बदल गया। वर्ष 2013 में इस संबंध में एक एफआईआर भी दर्ज कराई गई। इसके बाद दंपती ने सिविल कोर्ट में याचिका दायर कर यह घोषणा कराने की मांग की कि युवक उनका पुत्र नहीं है और जन्म रिकॉर्ड गलत है। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, एक समय पर दोनों पक्षों ने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर यह स्वीकार किया था कि गलत एंट्री पुरुष के बड़े भाई से हुई थी और इसे सुधारा जाएगा, लेकिन वर्षों तक यह सुधार नहीं किया गया।














