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सरसंघचालक मोहन भागवत अक्सर ‘हिंदू’ को लेकर संबोधित करते रहे हैं। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की वैचारिकता भी है। कोई भी संगठन या उसका नेतृत्व अपनी विचारधारा का प्रचार कर सकता है। भागवत का मानना है कि भारत का प्रत्येक नागरिक बुनियादी और आत्मा के स्तर पर ‘हिंदू’ है। उसकी पूजा-पद्धति भिन्न हो सकती है। यानी मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि समुदाय भी ‘हिंदू’ हैं। यह भारत का समावेशी चरित्र है। हमारे राष्ट्र में ‘विविधता में एकता’ आज भी बरकरार है और पूरे समन्वय, सौहार्द, स्नेह, भाईचारे के साथ बरकरार है। इसका बुनियादी कारण यह है कि हम समाज और राष्ट्र के तौर पर ‘हिंदू’ हैं। सरसंघचालक ने चार प्रकार के हिंदू बताए हैं। यह व्यावहारिक नहीं है और ‘विविधता में एकता’ वाले देश में आध्यात्मिकता का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। जो हिंदू है, वह हिंदू ही है, बेशक वह अपने ‘हिंदूपन’ को प्रचारित करे अथवा न करे या ‘हिंदू’ होने को भूल जाए अथवा ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ का उद्घोष करे। संघ प्रमुख के हिंदू वर्गीकरण को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे हिंदू विद्वान, मनीषी, राजनेता, समाजसेवी, वैज्ञानिक आदि हुए हैं, जो सोच के स्तर पर ‘नास्तिक’ थे। वे मंदिर-मठ नहीं जाते थे और न ही नियमित पूजा-पाठ करते थे, लेकिन वे प्रकृति और परब्रह्म की ‘शक्ति’ को मानते थे। हालांकि उनकी व्याख्याएं भिन्न थीं। जरा सोचो, ‘आर्य समाज’ की स्थापना क्यों हुई थी? सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं के अस्तित्व और सक्रियता को क्यों नहीं मानते? भागवत उन व्याख्याओं से सहमत नहीं हैं। उनका अपना ‘थीसिस’ है। लेकिन लंबे अंतराल के इतिहासों में ऐसे ‘हिंदू’ आज भी जिंदा हैं और प्रासंगिक हैं। उन्हें भुलाया नहीं गया।

‘गर्व से हिंदू’ का नारा लगाने वाले राजनीतिक जमात के लोग हैं। उनका संबंध संघ, भाजपा, विहिप और बजरंग दल से है। यह नारा राम मंदिर आंदोलन के दौरान खूब गूंजा। भारत में जैन, बौद्ध, सिख सरीखे अल्पसंख्यक समुदाय भी हैं, जिनके धर्म और पूजा-पाठ की आस्थाएं अलग-अलग हैं, लेकिन उन्हें बुनियादी और आत्मिक तौर पर ‘हिंदू’ माना जाता रहा है। सरकारी दस्तावेजों में भी उन्हें ‘हिंदू’ के तौर पर दर्ज किया जाता रहा है। दलित, आदिवासी, ओबीसी भी ‘हिंदू’ हैं। सवाल है कि असली हिंदू कौन है और सोच-विचार के स्तर का हिंदू कौन है? देश के प्रधानमंत्री मोदी ओबीसी हैं, लेकिन उनके स्तर का कर्मकांडी और प्रतिबद्ध, नतमस्तक हिंदू कोई दूसरा नहीं है। भागवत को प्रयास करना चाहिए कि ‘हिंदू’ की परिभाषा और चरित्र तय किए जाएं, क्योंकि हिंदू सोच तो बड़ी व्यापक है। उसे प्रकारों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले मुसलमान, किसी भी स्तर पर, खुद को हिंदू नहीं मानते। उनके पुरखे हिंदू-सनातनी होंगे, उनके जबरन धर्मान्तरण किए गए होंगे, लेकिन आज का मुसलमान ‘जन्मजात इस्लामी’ है, जिसका ‘हिंदू’ होने से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं है। बिल्कुल विपरीत धु्रवों पर स्थित समुदाय हैं। भागवत देश के सभी समुदायों, वर्गों, धर्मों, मतों, संप्रदायों को ‘हिंदू’ मानते हैं, क्योंकि देश का नामकरण हिंदू सभ्यता-संस्कृति, इतिहास पर आधारित है, लेकिन हम ‘विविधता में एकता’ वाले देश हैं। सवाल यह है कि संघ प्रमुख बार-बार हिंदू के मुद्दे पर संबोधित क्यों करते हैं? वह हिंदुत्व की प्रासंगिक चर्चा करते हैं और धर्मान्तरण के विरोधी हैं। बेशक भारत की करीब 80 फीसदी आबादी हिंदू या हिंदूमता है, लेकिन संवैधानिक तौर पर भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ नहीं है। क्या भागवत उसकी पृष्ठभूमि और प्रस्तावना तैयार कर लोगों के मानस बदलने की कोशिश कर रहे हैं?

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