भारत आतंकवाद से छिला, जख्मी और असमय मौतों का देश है, लिहाजा आतंकवाद रोधी राष्ट्रीय नीति का स्वागत है। हम 1980 के दशक से बहुस्तरीय, बहुचेहरी आतंकवाद झेलते आए हैं। उसमें पाकपरस्त इस्लामी, जेहादी आतंकवाद है और पूर्वोत्तर के उग्रवाद भी हैं। खालिस्तानी आतंकवाद का सफाया हो चुका है। उसके बचे-खुचे खाडक़ू पाकिस्तान, कनाडा, अमरीका, जर्मनी आदि देशों में हैं और वे भारत-विरोधी प्रदर्शन करते रहते हैं। देश में नक्सली आतंकवाद ने भी असंख्य लाशें बिछाई हैं, लेकिन आज उसका अस्तित्व भी समाप्ति के कगार पर है। आतंकवाद ने 40-50 हजार जिंदगियां छीनी हैं। दूसरा आंकड़ा 70-80 हजार का है। जो भी हो, ये आंकड़े बेहद भयानक और खौफजदा हैं। यह हमारी सेना, अद्र्धसैन्य बलों और स्थानीय पुलिस की रणनीति का ही कमाल है कि आज भारत में इस्लामी अलगाववाद के अवशेष भी नहीं हैं। जो आतंकी हमले हाल ही में किए गए हैं, वे पाकिस्तानी आतंकियों ने किए हैं। अब जिन साजिशों के सुराग मिल रहे हैं और संदिग्ध आतंकियों की धरपकड़ की जा रही है, वे भी पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद सरीखे आतंकी संगठनों के कथित ‘जेहादी’ हैं। आज पंजाब और पूर्वोत्तर में आतंकवाद नहीं है, कुछ स्थानीय जातीय हिंसक विवाद जरूर हैं, लेकिन आतंकवाद के हत्यारे खतरे जरूर मंडरा रहे हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी प्रत्येक वैश्विक मंच पर आतंकवाद का जिक्र करते हैं और देशों के साथ समझौते करते हैं कि आतंकवाद एक साझा लड़ाई है। मानवता के लिए साझा खतरा है, आओ मिल कर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ें। बहरहाल इस संदर्भ में भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने देश की सर्वप्रथम आतंकवाद-रोधी राष्ट्रीय नीति की घोषणा की है।

नाम दिया गया है-‘प्रहार।’ अर्थात् प्रिवेंशन, रिस्पांस एंड हेल्थिंग अप्रोच टू एंटी टेररिज्म। पहली बार डिजिटल खतरे को भी ‘आतंकवाद’ माना गया है। इन खतरों में भारत को निशाना बनाते हुए किए गए साइबर हमले, आपराधिक हैकिंग, डार्क वेब, क्रिप्टो वॉलेट आदि नई तकनीकों के जरिए किए जाने वाले आतंकी वित्तपोषण भी शामिल हैं। इनसे निपटने की रणनीति बनाई जा रही है। ‘प्रहार’ में साफ किया गया है कि भारत आतंकवाद को किसी विशेष संप्रदाय, जातीयता, राष्ट्रीयता अथवा सभ्यता से नहीं जोड़ता। इसका बुनियादी मकसद आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करना है। दरअसल ये शब्द सरकार की तरफ से असंख्य बार बोले जा चुके हैं। खासतौर पर आतंकी हमले के बाद ऐसे वक्तव्य सामने आते रहे हैं। बुनियादी और मौजू सवाल, ‘प्रहार’ की घोषणा के बावजूद, यह है कि आतंकवाद की परिभाषा क्या है? संयुक्त राष्ट्र भी आज तक यह परिभाषा स्पष्ट नहीं कर सका है। यदि भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रीय नीति की घोषणा की है, तो आतंकवाद की परिभाषा भी स्पष्टत: बतानी चाहिए, क्योंकि देश को एक निश्चित ‘सुरक्षा सिद्धांत’ की जरूरत है। परिभाषा के अभाव में ‘प्रहार’ महज एक नीतिगत वक्तव्य से अधिक कुछ नहीं लगता। सवाल राष्ट्रीय नीति और उसकी स्वीकार्यता का है। देशवासी जानना चाहेंगे कि आतंकवाद का खतरा बाहर और भीतर से कितना है और सरकारी एजेंसियां किस तरह इन खतरों से निपट रही हैं?

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