भारी हंगामे और तीखी नोंकझोंक के बीच लोकसभा में एंटी पेपरलीक संशोधन बिल ध्वनि-मत से पारित करना पड़ा। इस बिल पर 45 सांसदों ने, 10 से ज्यादा घंटे की बहस के दौरान, अपनी बात रखी और संशोधन भी पेश किए, लेकिन बिल पर मत-विभाजन तक नहीं कराया गया। यह लोकतंत्र की सूक्ष्म एवं महत्वपूर्ण अनिवार्यता है। बिल ‘हां’ अथवा ‘ना’ के शोर में पारित नहीं कराया जाना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य और विडंबना है कि आज भी यही संसदीय व्यवस्था है। उम्मीद थी कि संसद का मानसून सत्र हंगामाखेज होगा, क्योंकि पेपरलीक के अलावा, राम मंदिर में चंदा-चढ़ावा चोरी, ई-20 एथेनॉल विवाद, परिसीमन, दलबदल सरीखे मुद्दे जन-सरोकार, लोकतांत्रिक शुचिता और आम आदमी की आस्था से जुड़े थे। यह भी अपेक्षा की जा रही थी कि जन-सरोकार के इन मुद्दों पर संसद में सार्थक, संरचनात्मक चर्चा होगी, लेकिन पेपरलीक से जुड़े बिल पर ही हमारे सांसदों की क्षुद्र और विरोधाभासी राजनीति बेनकाब हो गई। इसमें सत्ता-पक्ष के सांसद भी दूध के धुले हुए नहीं हैं। ऐसे एक सांसद ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री दिवंगत जवाहर लाल नेहरू पर ऐसी अभद्र और अश्लील टिप्पणी की, जिसे हम नैतिक रूप से लिखने के भी पक्षधर नहीं हैं। यह न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि संसदीय आचरण और बहस को गर्त में ले जाने वाला भी है। दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने, साक्ष्य और प्रमाणित किए बिना ही, बोल दिया कि प्रदर्शनकारी छात्रों पर पैलेट गन और बर्बर लाठीचार्ज का आदेश गृहमंत्री अमित शाह ने दिया था। देश के ‘तथाकथित’ गृहमंत्री युवा, छात्र आंदोलन के बाद कांप रहे थे और वह डरे हुए हैं, लिहाजा सदन में मौजूद नहीं हैं। नेता प्रतिपक्ष को ऐसे आरोपों और शब्दों का प्रयोग करने की जरूरत ही क्या थी? यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन और प्रदर्शन के वक्त गोलीबारी और घातक लाठीचार्ज का अंतिम निर्णय गृहमंत्री या प्रधानमंत्री लेते हैं। ऐसी संसदीय अज्ञानता पर हम क्या टिप्पणी करें? ऐसे आदेश मौके पर मौजूद मजिस्टे्रट (डीएम या एसडीएम) ही दे सकते हैं। आपात स्थितियों में पुलिस के डीसीपी या एसीपी को भी मजिस्टे्रट की शक्तियां प्रदान की जाती हैं। अब यह कैसी संसदीय मर्यादा और विरोधाभास है कि विपक्ष मानता है कि आंदोलित युवाओं पर कीलदार लाठियों से हमले किए गए और पैलेट गन भी चलाई गई, लेकिन बिल पर बहस का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री दफ्तर में राज्यमंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने पैलेट गोलीबारी से साफ इंकार किया है। अलबत्ता आंसू गैस के गोले दागने को जरूर स्वीकार किया है।
वस्तुस्थिति यह है कि एम्स की मेडिकल रपट में पैलेट गन की पुष्टि की गई है, लेकिन दिल्ली पुलिस जिस अस्पताल का उल्लेख कर रही है, उसकी रपट में पैलेट की पुष्टि नहीं की गई है। क्या चिकित्सा के पेशेवर अस्पताल की मर्यादा, नैतिकता और शुचिता भी विरोधाभासी हो गई है, लिहाजा मर्यादाएं खंडित हो रही हैं? एक और तथ्य गौरतलब है कि सीआरपीएफ के विशेष बल आरएएफ के डिप्टी कमांडेंट ने संसद मार्ग पुलिस स्टेशन की डायरी में पैलेट गन चलाने की घटना दर्ज कराई है। बताया जा रहा है कि आरएएफ के 12 जवानों के हाथ में पैलेट गन थी। सरकार का बयान भिन्न है, नेता प्रतिपक्ष के आरोप बेहद गंभीर हैं और दिल्ली पुलिस, सुरक्षा बलों के रिकॉर्ड सबसे अलग हकीकत बयां कर रहे हैं! क्या देश की इन व्यवस्थाओं के बीच भी मर्यादा, आचार-संहिता नहीं होनी चाहिए? बहरहाल लोकसभा में बहस हुई, बिल पारित हो गया, राज्यसभा में पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी से कानून भी बन जाएगा, लेकिन कई अहम सवाल फिर भी बरकरार रहेंगे। मसलन-शिक्षा का बजट जीडीपी के 4 फीसदी से घटा कर 2.6 फीसदी क्यों किया गया? भारत में औसत शिक्षा 10 गुना महंगी क्यों हो गई है? सरकारी स्कूल में औसतन पढ़ाई का खर्च 2863 रुपए है, जबकि निजी स्कूल में वही खर्च 25,000 रुपए से अधिक क्यों है? कुछ सवाल हमने पिछले संपादकीय में भी उठाए थे। इनके जवाब कौन देगा? प्रधानमंत्री मोदी इस संशोधन बिल पर पूरी बहस के दौरान सदन में नहीं बैठे, लेकिन अब तो उन्हें ही देश को खुलासा करना पड़ेगा कि शिक्षा-व्यवस्था में इतने विरोधाभास क्यों हैं? यह एक सत्य है कि केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार करने के लिए मात्र कानून बना देने से शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हो जाएगा। पूरी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। तभी युवाओं का भविष्य उज्ज्वल हो पाएगा। युवा पीढ़ी देश का भविष्य है, अत: उसकी आवाज को सुना जाना चाहिए।



















