ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई मार दिए गए। अमरीका-इजरायल ने एक हमले में उस परिसर पर एक साथ 30 विनाशक बम बरसाए, जहां खामेनेई और उनका परिवार रहते थे। खामेनेई ‘सेफ बंकर’ में बताए जा रहे थे, लेकिन बम का बारूद वहां तक भी पहुंच गया। परिसर तबाह होकर मिट्टी-मलबा हो गया। खामेनेई कैसे बच सकते थे? उनके परिवार में बहू, दामाद और एक पौत्री भी विनाशक बम के शिकार हो गए। यही नहीं, मानवतावादी संगठन ‘ईरानियन रेड क्रीसेंट’ की रपट में खुलासा किया गया है कि ईरान में 201 लोगों की मौत हो चुकी है और 747 घायल हैं। यकीनन यह नरसंहार से भी बढ़ कर सामूहिक कत्लेआम है। ईरान के 31 प्रांतों में से 24 प्रांत युद्ध से प्रभावित हैं। ये आंकड़े बढऩा तय है, क्योंकि युद्ध अभी जारी है। खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने हमले बहुत तेज कर दिए हैं। इजरायल की राजधानी तेल अवीव में सेना के स्टाफ मुख्यालय पर मिसाइल हमला किया गया है। करीब 3 लाख लोग इजरायल में बंकरों में छिपे हैं। यह युद्ध आपसी नफरत और अस्तित्व को मिटा देने की सनक में शुरू किया गया है। खामेनेई की मौत के बावजूद ईरान की हुकूमत यथावत है। खामेनेई के बेटे मोजतबा को ईरान का नया सुप्रीम लीडर घोषित भी कर दिया गया है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कुरान का हवाला देते हुए खामेनेई की मौत का बदला लेने की कसम खाई है। ईरान में 40 दिन का मातम है। लोग रोते-बिलखते नारे लगा रहे हैं-‘लड़ेंगे, मरेंगे, लेकिन सरेंडर नहीं करेंगे।’ बहरहाल ईरान में जब तक ‘रिवोल्यूशनरी गाड्र्स’ के लड़ाके जिंदा हैं और युद्धरत हैं, तब तक यह जंग खत्म नहीं हो सकती। यह एक ‘स्वघोषित शांतिदूत’ द्वारा थोपे गए महायुद्ध का अभी तक का निष्कर्ष है, जो आंशिक है। क्या युद्ध भी कोई शांति-प्रयास हो सकता है? दरअसल जब से टं्रप अमरीका के राष्ट्रपति चुने गए हैं और वह ‘व्हाइट हाउस’ में आए हैं, तभी से दुनिया में युद्ध भडक़ रहे हैं, बल्कि फैल रहे हैं। इतना ही नहीं, अमरीका बनाम यूरोप और अमरीका बनाम नाटो के तौर पर तीखे तनाव भी सामने आए हैं। हास्यास्पद् है कि राष्ट्रपति टं्रप लगातार दावे करते रहे हैं कि उन्होंने 8 युद्ध रुकवाए हैं। उनमें वह भारत-पाक युद्ध को भी गिनवाते हैं, जो सफेद झूठ है, तथ्यों से परे है। रूस-यूक्रेन युद्ध चार साल के बाद भी जारी है, जिसे एक माह में खत्म करने के आश्वासन पर टं्रप ने अमरीकी जनमत का जुगाड़ किया था।

अब अमरीका ने इजरायल के साथ ईरान पर महायुद्ध थोपा है, क्योंकि राष्ट्रपति टं्रप ईरान में परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ हैं। ईरान की कथित तानाशाह और क्रूर हुकूमत को बदलना चाहते हैं। क्या राष्ट्रपति टं्रप दुनिया भर के ठेकेदार हैं, जो दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाना चाहते हैं? क्या विश्व में अब संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और सीमाओं की गरिमा शेष नहीं बची है? क्या संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद और संबद्ध एजेंसियों की प्रासंगिकता भी समाप्त हो चुकी है? ईरान की नाकेबंदी के लिए राष्ट्रपति टं्रप ने करीब 50 फीसदी वायुसेना और नौसेना को मध्य-पूर्व में तैनात कराया है। युद्ध की शुरुआत ही 200 लड़ाकू विमानों के हमलों के साथ की गई और ईरान के प्रमुख शहरों में तबाही मचा दी। इजरायल ने ईरान के मिनाब शहर के एक स्कूल पर ऐसा मिसाइल हमला किया कि उसमें 148 मासूम छात्राओं की मौत हो गई। क्या यह शांति का कोई नया महायुद्ध है? खाड़ी देशों में करीब 1 करोड़ भारतीय बसे और काम कर रहे हैं। ईरान ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन, जॉर्डन, कुवैत, इराक और दुबई पर लगातार हमले कर खाड़ी देशों के समीकरण को बिगाड़ दिया है। ईरान ने होर्मुज के उस संकरे रास्ते को भी बंद कर दिया है, जिससे 20 फीसदी तेल दुनिया के देशों में जाता है। भारत में करीब 90 फीसदी तेल, करीब 55 लाख बैरल प्रतिदिन, इसी रास्ते से आता है। यदि युद्ध के कारण यह रास्ता कुछ और दिन बंद रहा, तो विश्व में तेल और गैस के लिए हाहाकार मचने लगेगा, लिहाजा फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, कोलंबिया ने हमले की कटु आलोचना की है और युद्ध रोकने को टं्रप से अपील की है। क्या युद्ध यहीं रुक सकता है? खाड़ी देशों में बसे प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के लिए भारत को पुख्ता व्यवस्था करनी चाहिए। अगर यह लड़ाई लंबी खिंचती है, तो सभी का कुछ न कुछ नुकसान तो अवश्य ही होगा। युद्ध में दोनों पक्षों को नुकसान होता है, इसलिए बेहतर यही रहेगा कि जल्द से जल्द इस लड़ाई को रोक दिया जाए और बातचीत के जरिए मसला हल किया जाए।

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