इसमें कोई दोराय नहीं कि संसद में सीटों की संख्या में बढ़ोतरी समय की जरूरत हो सकती है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत इसमें बदलाव हो सकते हैं। मगर इस वर्ष परिसीमन की कवायद को लेकर कई सवाल उभरते दिख रहे हैं। खासतौर पर दक्षिण भारत के राज्यों की ओर से यह आशंका जताई जा रही है कि परिसीमन के ताजा प्रस्ताव के तहत जो प्रारूप सामने आया है, अगर वह अमल में आया तो यह व्यापक स्तर पर भेदभाव का कारण बनेगा।

हालांकि इस तरह के कदम उठाने से पहले देशभर में सर्वसम्मति कायम करने की अपेक्षा की जाती है, ताकि राज्यों के बीच मतभेद न उपजे, लेकिन परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार की पहल के बाद तमिलनाडु में जिस तरह का विरोध उभर रहा है, उससे कई सवाल उठे हैं। गौरतलब है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने गुरुवार को केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन की कवायद के खिलाफ विरोध को तेज करते हुए इससे संबंधित विधेयक की प्रति जला कर और काला झंडा दिखा कर पूरे राज्य में आंदोलन की शुरुआत कर दी। इससे पहले स्टालिन ने यहां तक कहा था कि तमिलनाडु की चिंता को दूर किए बिना अगर परिसीमन को आगे बढ़ाया गया, तो राज्य में एक समय चले हिंदी विरोधी आंदोलनों जैसी स्थिति बन सकती है।

निश्चित रूप से एक संवेदनशील मुद्दे पर देश के अलग-अलग राज्यों में इस स्तर के मतभेद पैदा नहीं होने चाहिए थे और इससे जुड़ी चिंताओं का समाधान वक्त की जरूरत है। मगर हैरानी की बात यह है कि क्या केंद्र सरकार को इसका आभास नहीं था कि लोकसभा में सीटों की संख्या में बढ़ोतरी के क्रम में उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच जिस तरह का असंतुलन पैदा होने वाला है, उससे कई स्तर पर असंतोष उभर सकता है! दरअसल, सरकार परिसीमन को महिला आरक्षण के साथ जोड़ कर पेश करने का प्रयास कर रही है, ताकि इसे लेकर उठने वाली आपत्तियों को कमजोर किया जा सके।

मगर विपक्षी दलों की ओर से ऐसे सवाल उठाए जा रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग राज्यों में लोकसभा की सीटों में बढ़ोतरी संसद के समीकरण में वैसे राज्यों को मजबूत स्थिति में खड़ा करेगा, जहां भारतीय जनता पार्टी ताकतवर है। इसके अलावा, सीटों के फिर से बंटवारे के क्रम में जो नया समीकरण बनेगा, उसमें दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व और अधिकारों में काफी कमी आने की आशंका जताई जा रही है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कई राज्यों की नुमाइंदगी में काफी बढ़ोतरी हो जाएगी।

शायद यही वजह है कि तमिलनाडु में इस मसले पर व्यापक असंतोष उभर रहा है। तेलंगाना, कर्नाटक और केरल आदि राज्यों में भी परिसीमन में आबादी के आधार पर लोकसभा की सीटों में वृद्धि होने पर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या दक्षिण भारतीय राज्यों को परिवार नियोजन को लेकर बेहतर प्रदर्शन का खमियाजा उठाना पड़ रहा है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि स्टालिन ने परिसीमन संशोधन को दक्षिणी राज्यों के खिलाफ और देश की प्रगति में योगदान देने की सजा तक कहा है।

सवाल है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार को सभी राज्यों को विश्वास में लेने की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई। एक पक्ष यह है कि परिसीमन का मुख्य आधार चूंकि जनगणना होता है, तो नई स्थितियों में इससे संबंधित किसी कवायद पर उठने वाले सवालों का हल क्यों नहीं निकाला गया? कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि अगर परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो इस मसले पर उभरने वाली आपत्तियों पर गौर किया जाए और सभी राज्यों के बीच सहमति कायम की जाए।

अमित शाह ने कहा कि ऐसी धारणा पैदा की जा रही है कि इन तीनों विधेयकों के पारित होने से दक्षिण राज्यों की संख्या लोकसभा में बहुत कम हो जाएगी और उन्हें बड़ा नुकसान होगा। उन्होंने इसे खारिज करते हुए कहा कि कर्नाटक में अभी 28 लोकसभा सीट हैं जो कुल 543 सीट का 5.15 प्रतिशत हैं, लेकिन ये विधेयक पारित होने के बाद कर्नाटक के सदस्यों की संख्या 42 हो जाएगी जो कुल 816 सीटों का 5.14 प्रतिशत होगी। शाह ने कहा कि आंध्र प्रदेश में अभी 25 लोकसभा सीट हैं और उसका प्रतिनिधित्व 4.6 प्रतिशत है जो परिसीमन के बाद 38 (4.65 प्रतिशत) हो जाएंगी। 

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