थोथा चना, बाजे घना? दो संवैधानिक पदधारकों राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री के बीच परिहार्य वाक्युद्ध? जी हां। क्या इस पर सार्वजनिक रूप से तू-तू, मैं-मैं होनी चाहिए? बिल्कुल नहीं। इसकी शुरूआत राष्ट्रपति मुर्मू के सिलीगुड़ी में 7 मार्च को 9वें अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में भाग लेने से हुई, जहां पर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया गया। 

इस सम्मेलन में आदिवासियों की कम उपस्थिति पर खिन्नता प्रकट करते हुए राष्ट्रपति ने प्रश्न उठाया कि सम्मेलन स्थल विधान नगर से गोसियापुर क्यों स्थानांतरित किया गया। उन्होंने कहा कि ममता मेरी छोटी बहन जैसी है। मैं भी बंगाल की बेटी हूं। मैं नहीं जानती कि क्या वे परेशान हैं। शायद राज्य सरकार आदिवासियों का कल्याण करना नहीं चाहती, इसलिए उन्हें यहां आने से रोका गया है। उनके इस बयान के बाद खूब शोर-शराबा हुआ। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने ब्ल्यू बुक, जिसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उनके पारिवारिक सदस्यों के लिए सुरक्षा और प्रोटोकॉल की रूपरेखा निर्धारित की गई है, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान उसके उल्लंघन की जांच शुरू की, जिसमें सम्मेलन में मुख्यमंत्री, राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक द्वारा राष्ट्रपति के आगमन पर उनके स्वागत में उपस्थित न होना भी शामिल है। 

राज्य सरकार ने यह कहते हुए किसी भी प्रोटोकॉल के उल्लंघन का खंडन किया कि राष्ट्रपति की अगुवाई सिलीगुड़ी के मेयर, पुलिस आयुक्त और जिला मैजिस्ट्रेट द्वारा की गई। इसकी बजाय ममता बनर्जी ने इस चयनात्मक विरोध पर प्रश्न उठाया और कहा कि आप तब विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं करते, जब आदिवासियों के विरुद्ध अत्याचार होते हैं। चुनाव के समय पर भाजपा की सलाह के अनुसार राजनीति मत कीजिए, जो चुनाव के निकट आते ही बंगाल को निशाना बना रही है। ममता ने कहा कि मैं इस कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकी क्योंकि मैं एस.आर.आई. के मुद्दे पर लोगों के लिए धरने पर बैठी हूं। मेरी प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? राष्ट्रपति के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि मुर्मू की टिप्पणियां भाजपा द्वारा प्रभावित हैं और उन्हें यहां राजनीति करने के लिए भेजा गया है।  

उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति से इस सम्मेलन में भाग लेने की अपेक्षा नहीं की जाती थी क्योंकि यह राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित नहीं, एक निजी कार्यक्रम था और  राज्य प्रशासन ने आगाह कर दिया था कि वह ऐसे सम्मेलन का आयोजन करने के लिए तैयार नहीं है, जिसमें राष्ट्रपति भी आ रही हैं। यह मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। ममता ने आरोप लगाया कि भाजपा राष्ट्रपति का सम्मान  नहीं करती। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान एक फोटोग्राफ  दिखाते हुए उन्होंने बताया कि इस तस्वीर में मोदी बैठे हुए हैं और राष्ट्रपति खड़ी हैं। यह सरासर राष्ट्रपति का अपमान है।  

प्रधानमंत्री ने इस घटना पर टिप्पणी की कि यह शर्मनाक और अभूतपूर्व है और तृणमूल सरकार पर राष्ट्रपति का अपमान करने का आरोप लगाया। किंतु मुख्य तथ्य यह है कि राष्ट्रपति अपने समुदाय के सम्मान में आयोजित सम्मेलन में गईं और वहां उन्हें लगा कि उनका स्वागत नहीं किया जा रहा। राजनीतिक संदर्भ जो भी हो, यह ऐसा आरोप नहीं है जिसे कोई भी राज्य सरकार आसानी से नजरंदाज कर सके। चाहे कोई कार्यक्रम सार्वजनिक हो या निजी, राज्य सरकार संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्रपति को पूर्ण वी.वी.आई.पी. सुरक्षा और व्यवस्था करने के लिए बाध्यकारी है।  

तथापि यह घटना अन्य सामान्य राजनीतिक टकराव से अलग है। राष्ट्रपति मुर्मू स्वयं संथाल समुदाय से हैं और वह आदिवासी समुदाय की पहली राष्ट्रपति हैं और इसीलिए उन्हें अपनी निराशा और खिन्नता व्यक्त करनी पड़ी जो केन्द्र-राज्य संबंधों को शासित करने वाले स्थापित मानदंडों से अलग हैं क्योंकि भारत के हालिया राजनीतिक इतिहास में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जहां पर वर्तमान राष्ट्रपति ने अपनी यात्रा के दौरान राज्य सरकार के इरादों पर प्रश्न उठाया हो। 
वस्तुत: यह विवाद एक गरमागरम चुनावी माहौल के समय पैदा हुआ जहां पर भाजपा और तृणमूल दोनों ही इससे लाभ उठाना चाहती हैं। स्पष्ट है कि भाजपा तिल का ताड़ बनाना चाहती है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के साथ उसके संबंध पहले से तनावपूर्ण हैं और दोनों ही पक्ष राज्य में आगामी चुनावों से पूर्व नैरेटिव बनाना चाहते हैं। भाजपा यह स्पष्ट करना चाहती है कि राष्ट्रपति का अपमान एक गंभीर संवैधानिक मुद्दा है तो तृणमूल का कहना है कि बंगाल सरकार पर हमला करने के लिए नियमित प्रशासनिक मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। 

समय आ गया है कि केन्द्र और राज्यों को यह समझना चाहिए कि यदि एक-दूसरे के अधिकारों और स्वायत्तता के बीच संतुलन न बनाया जाए तो उनका मान नहीं रह जाता। प्रत्येक संघीय प्रणाली शक्ति, अधिकार और संयम के नाजुक संतुलन से चलती है। इसके लिए संघ की इच्छा और राज्य के जनादेश के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। संविधान में यह संतुलन केन्द्र के पक्ष में है और यह प्रणाली इसलिए चल रही है कि केन्द्र ने परिपाटियों को माना है। 

इस घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रपति की भूमिका है। संवैधानिक प्रहरी के रूप में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे दलगत संघर्ष से उपर उठें और गणतंत्र की गरिमा का प्रतीक बनें और तुच्छ मुद्दों के लिए इसका उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। ममता को भी समझना चाहिए कि एक स्ट्रीट फाइटर और समस्या पैदा करने वाले के रूप में उनकी प्रतिष्ठा उनके दीर्घकालीन हित में नहीं है। यह बात भाजपा पर भी लागू होती है। दोनों को यह समझना चाहिए कि सत्ता से अहंकार पैदा होता है जिसके चलते पराजय होती है।-पूनम आई. कौशिश

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