‘शाखा’ जैसी अद्वितीय प्रणाली के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण का कार्य संघ करता है। इसी से लाखों स्वयंसेवक तैयार हुए हैं, जिनके जीवन के आदर्श व्यवहार से समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखता है। संघ की कार्यपद्धति अन्य संगठनों से भिन्न और विशिष्ट है। बाल स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक, सभी एक ही आदेश पर कार्य करते हैं। शाखा में होने वाले छोटे-छोटे कार्यक्रमों के माध्यम से अनुशासन और संस्कार विकसित होते हैं। संघ के साथ ही समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्वयंसेवकों ने 40 से 
अधिक संगठनों, जैसे ए.बी.वी.पी., लघु उद्योग भारती, सेवा भारती, विद्या भारती की स्थापना की, जो अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। ये सभी स्वतंत्र, स्वायत्त और स्वावलंबी संगठन हैं। भारत को पुन: ‘विश्वगुरु’ के स्थान पर प्रतिष्ठित कर भारत माता को परम वैभव पर ले जाना ही इनका मुख्य उद्देश्य है।

आर.एस.एस. के पहले चार प्रचारक : 1925 में  संगठन के रूप में आकार लेने पर आर.एस.एस. के आद्य सरसंघचालक डा. हेडगेवार के सामने चुनौती थी कि संघ के विचारों का देशभर में प्रचार-प्रसार कैसे किया जाए। उन्हें समॢपत, पूर्णकालिक और संघ की भावना में दीक्षित कार्यकत्र्ताओं की तलाश थी। प्राचीन समय में जैसे ऋषि-महॢष परम्परा थी, जो जीवन प्रणाली का अध्ययन कर अलग-अलग समय पर मनुष्य जीवन में आने वाली समस्या का हल प्राणी मात्र को देते थे, उसी प्रकार प्रचारक भी राष्ट्र निर्माण के कार्य में उत्पन्न विभिन्न समस्याओं का निराकरण करने में मार्गदर्शन करते हैं। इस परम्परा में पहले 4 प्रचारक थे बाबा साहब आप्टे, दादा राव परमार्थ, रामभाऊ जमगडे और गोपाल राव येरकुंटवार।

2 वर्ष तक प्रशिक्षण के बाद 1929 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने प्रचारक व्यवस्था को औपचारिक रूप देने की शुरूआत की। 1930 में जब डा. हेडगेवार सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए जंगल सत्याग्रह में भाग लेने पहुंचे तो सरसंघचालक के पद से इस्तीफा दिया। डा. परांजपे को नया सरसंघचालक बनाया गया। डा. हेडगेवार को पता था कि उन्हें जेल भी जाना पड़ सकता है। 1931 में बाबा साहब आप्टे को डा. हेडगेवार ने जेल से बाहर आने के बाद पूर्णकालिक प्रचारक बनाने के लिए चुना। इस तरह इन चारों को संघ की पहली प्रचारक टोली के तौर पर जाना जाता है। इनमें बाबा साहब आप्टे को प्रथम प्रचारक माना जाता है। संघ के पहले पूर्णकालिक प्रचारकों की दीक्षा के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम नागपुर में रखा गया, जहां प्रमुख स्वयंसेवक उपस्थित थे। उसी कार्यक्रम में डा. हेडगेवार का छोटा सा सम्बोधन हुआ, जिसमें संगठन का संकल्प और प्रचारकों का जीवन साधुओं की तरह होना चाहिए, इसी पर उनका जोर था। उसके बाद उनके केन्द्र बताए गए कि उनको प्रचार के लिए किस शहर या प्रांत में जाना है। 

उत्तर-पूर्व में ‘संघ के बीज’ बोने वाले पहले प्रचारक : दादाराव परमार्थ यानी गोविंद सीताराम परमार्थ नागपुर के रहने वाले थे। 10वीं की परीक्षा की उत्तरपुस्तिका में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली। अध्यापकों ने उन्हें फेल कर दिया, अत: वह पढ़ाई छोड़कर डा. हेडगेवार के साथ जुड़े और स्वयंसेवक बन गए। 1930 के जंगल सत्याग्रह में डा. हेडगेवार के साथ गए और जेल भी गए। बीमार पड़े तो जेल में डा. हेडगेवार ने ही उनकी देखभाल की थी। उत्तर पूर्व में संघ का कार्य विस्तार करने वाले वह पहले प्रचारक थे।

भविष्य के प्रचारकों को जोडऩे वाले गोपाल राव येरकुंटवार : गोपाल राव येरकुंटवार ने उस दौर में जितने समॢपत प्रचारकों को तैयार किया, शायद ही किसी ने किया होगा। उनमें से एक थे भास्कर राव कलाम्बी, जिन्हें वनवासी कल्याण आश्रम के काम को शुरू करने का श्रेय जाता है। पंजाब में शुरुआत में संघ पताका फहराने वाल मोरेश्वर राघव या मोरूभाई मुंजे को भी गोपाल राव लेकर आए थे। इन सभी प्रचारकों के नाम संघ के इतिहास में कई तरह की उपलब्धियां दर्ज हैं। केशव आप्टे ने तो 33 श्लोक का एक ‘भारतभक्ति श्रोत’ रच डाला था। उनका दशकों तक भारत के इतिहास के पुनर्लेखन पर काम चलता रहा। आप्टे ने कभी अपने हाथ से लिखकर ‘दासबोध’ और टाइप करके वीर सावरकर की किताब ‘1857 स्वातंत्र्य समर’ अनेक नवयुवकों को उपलब्ध करवाई थी। 

आर.एस.एस. के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत जी के शब्दों में, ‘‘हम लोग, अपनी दृष्टि से विचार करके जो अच्छा लगता है, वह बोल सकते हैं। जो खराब लगता है, वह भी बोल सकते हैं। लेकिन बोलने के पीछे कोई विरोध की भावना नहीं है। संघ न किसी विरोध में चलता है और न किसी बैर भाव से। ‘न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।’ और दोस्ती कहें तो सब अपने हैं। सबके प्रति प्रेम है। उस प्रेम के आधार पर और स्वयंसेवकों की निष्ठा, तपस्या के आधार पर हम यहां तक पहुंचे हैं। कितने बड़े त्याग हुए, कितने बड़े बलिदान हुए, उस पर हम खड़े हैं। यह हम जानते हैं। उनके प्रति मन में जो भाव है, उसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। संघ को हमको आगे ले जाना है। क्यों ले जाना है, क्योंकि भारत को खड़ा करना है।’’-सुखदेव वशिष्ठ

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