राजनीति बदमाशों का अंतिम अड्डा है और आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा के 7 सांसदों द्वारा भाजपा में दलबदल करने ने इस बात की पुन: पुष्टि कर दी है। इन सांसदों ने इस सिद्धान्त का पालन किया कि सत्ता भ्रष्ट बनाती है और परम सत्ता परम भ्रष्ट बनाती है। इन सांसदों द्वारा जो स्पष्टीकरण दिया गया वह आम है। ‘आप’ रास्ता भटक गई है। नेतृत्व पर जनता विश्वास नहीं करती और अंतरात्मा कहती है कि इसमें सुधार किया जाए। क्या वास्तव में ऐसा है? यह सच है कि 10 में से 7 सांसद, जिन्होंने राज्यसभा में ‘आप’ की ताकत को घटाकर सिर्फ 3 कर दिया, उन्होंने दलबदल विरोधी कानून के तहत दो-तिहाई की सीमा को पार कर लिया था। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राजद, डी.एम.के. और एन.सी.पी. के नेताओं ने भी ऐसा ही किया, जो उसी परिस्थितियों और समय के साथ भाजपा में शामिल हो गए।

साफ है कि यह सिर्फ किसी एक पार्टी के अपनी विचारधारा से भटकने का मामला नहीं है। यह एक ऐसे राजनीतिक माहौल का मामला है, जहां विचारधारा खुद ही लचीली, सौदेबाजी वाली और कभी-कभी तो गौण होती जा रही है। यह सिलसिला इतना पुराना और आजमाया हुआ है कि अब इस पर हैरानी भी नहीं होती। बाहरी दबाव, अंदरूनी कलह, लहजे में साफ बदलाव और उसके बाद बिना किसी रुकावट के राजनीतिक पाला बदलना। 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले ‘आप’ के एकमात्र सत्ताधारी राज्य से नेताओं का इस तरह पार्टी छोड़कर जाना, उसकी यात्रा में एक निर्णायक मोड़ माना जाना चाहिए। याद कीजिए, 2012 में भ्रष्टाचार मुक्त भारत के अपने नारे के दम पर ‘आप’ ने दिल्ली में जबरदस्त जीत हासिल की थी और बहुत तेजी से एक विरोध आंदोलन से दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी बन गई थी। लेकिन पार्टी का ढांचा ज्यादा केंद्रीकृत हो गया। फैसले लेने की शक्ति धीरे-धीरे एक छोटे से नेतृत्व समूह तक सिमट गई, जिसमें रणनीतिक, चुनावी और सांगठनिक मामलों पर केजरीवाल का पूरा नियंत्रण था। जहां एक तरफ इससे ‘आप’ को अपनी एकजुटता और चुनावी ताकत बनाए रखने में मदद मिली, वहीं दूसरी तरफ इससे पार्टी के भीतर असहमति या विरोध की गुंजाइश भी कम हो गई।

फरवरी 2025 में उसे सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब घमंड और ई.डी. व सी.बी.आई. के सख्त रुख की वजह से उसे दिल्ली में भाजपा के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी। इसके परिणामस्वरूप, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस हार के प्रति एक तरह का उदासीन या हार मान लेने वाला रवैया अपना लिया। इससे पार्टी के भविष्य पर सवाल उठने लगे और उसकी अंदरूनी कमजोरियां उजागर हो गईं। जब आप पंजाब में सत्ता में आई, तो साफ-सुथरी सरकार, भ्रष्टाचार-मुक्त शासन और आॢथक राहत देने के प्रति उसका उत्साह और भी कम हो गया। इसके साथ ही, राजनीति के प्रति उसका नजरिया विचारधारा-विहीन होता गया। वह अल्पकालिक फायदों के पीछे भागने लगी। कभी सर्वसम्मति से संचालित आंदोलन के ढांचे में काम करने वाले नेता खुद को तेजी से आदेश-आधारित राजनीतिक संगठन में पाते रहे, जो पिछले कुछ वर्षों में हुए इस्तीफों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इस्तीफा देने वालों ने अक्सर आंतरिक लोकतंत्र की कमी, सीमित संवाद या संस्थापक सिद्धांतों से वैचारिक विचलन का हवाला दिया।

पार्टी नेतृत्व की एक मजबूत टीम को संस्थागत रूप देने के लिए संघर्ष कर रही है। इसे आंतरिक लोकतंत्र, उत्तराधिकार योजना और संगठनात्मक स्थिरता के बारे में भी सवालों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ नेता इस बात से असहज हैं कि पार्टी केजरीवाल और उनके छोटे से करीबी समूह के इर्द-गिर्द घूमती है, जो जल्द ही तनाव का कारण बन सकता है। इसके साथ ही, अखिल भारतीय शक्ति बनने की इसकी महत्वाकांक्षा कुछ राज्यों को छोड़कर पूरी तरह साकार नहीं हो पाई है। दिल्ली की उत्पाद शुल्क नीति मामले में ई.डी.-सी.बी.आई. की निरंतर जांच से पार्टी के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और राजनीतिक स्थिरता चाहने वाले नेताओं में झिझक है, जिससे सीमित प्रभाव महसूस होने पर टकराव पैदा हो सकता है। न केवल पंजाब में, बल्कि दिल्ली में भी और अधिक दलबदल देखने को मिल सकते हैं, विधायक और एम.सी.डी. पार्षद भाजपा के करीब जाने की कोशिश कर रहे हैं।

जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि ‘आप’ को अपने अस्तित्व का संकट झेलना पड़ सकता है। दिल्ली के उलट, जहां यह अपना शासन का मॉडल दिखा सकती है, पंजाब से ऐसा कोई भी सकारात्मक नैरेटिव सामने नहीं आ रहा। इसके कामकाज की लगातार आलोचना होती रही है और आरोप लगते रहे हैं कि केजरीवाल सुपर मुख्यमंत्री की तरह काम करते हैं, जबकि मान को किनारे कर दिया गया है। इसके अलावा, पार्टी में कोई खास ठोस बढ़त भी देखने को नहीं मिली है। अफसोस की बात है कि नेताओं के दलबदल के बाद, पार्टी के भीतर इस बात पर और अधिक जीवंत बहस की उम्मीद थी कि क्या गलत हुआ और अब क्या किया जाना चाहिए, लेकिन इसकी बजाय हमेशा की तरह एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। निश्चित रूप से सत्ता जाने और दलबदल के कारण किसी पार्टी को कभी भी पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन चूंकि इसने भ्रष्टाचार मुक्त भारत के अपने मूल सिद्धांतों से हटकर मुफ्त और कल्याणकारी योजनाओं की ओर रुख किया है, इसलिए केवल आर्थिक राहत उपायों से आम आदमी पार्टी को वह विशिष्टता नहीं मिल पाएगी जो कभी उसके पास थी।-पूनम आई. कौशिश

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