जब शिक्षा ज्ञान का माध्यम न रहकर केवल प्रतिस्पर्धा और बाजार का उपकरण बन जाए, तब सबसे बड़ा संकट नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं पर आता है। ‘शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जन नहीं, बल्कि जीवन का निर्माण है।’ यह विचार आज के भारत में कहीं धुंधला पड़ता दिखाई देता है। जिस शिक्षा को कभी मनुष्य के बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान का माध्यम माना जाता था, वही आज अंकों, रैंक और प्रतियोगिताओं की संकीर्ण परिधि में सिमटती जा रही है। भारत, जो विश्व की सबसे युवा आबादी वाला राष्ट्र कहा जाता है, आज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है, जहां युवाओं की ऊर्जा ज्ञान-सृजन में नहीं, बल्कि अंतहीन परीक्षाओं और प्रतिस्पर्धाओं की दौड़ में खपती जा रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा देश एक विशाल परीक्षा केंद्र में परिवर्तित हो चुका हो। हाल ही में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में कथित प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा प्रणाली पर उठे गंभीर प्रश्नों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया। लाखों विद्यार्थियों की वर्षों की तपस्या, उनके सपने और परिवारों की आशाएं एक झटके में संदेह के घेरे में आ गईं। जिन युवाओं ने दिन-रात परिश्रम कर अपनी आकांक्षाओं को सींचा, उनके मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठा कि क्या आज सफलता का आधार केवल श्रम और प्रतिभा है, अथवा धन, प्रभाव और अनैतिक साधनों का गठजोड़? स्वामी विवेकानंद ने कहा था- ‘शिक्षा मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।’

किंतु वर्तमान व्यवस्था में शिक्षा आत्म-विकास की प्रक्रिया न रहकर केवल प्रतिस्पर्धात्मक अस्तित्व का माध्यम बनती जा रही है। एक बालक जैसे ही विद्यालय में प्रवेश करता है, उसी क्षण से उस पर ‘सफलता’ का अदृश्य दबाव आरोपित कर दिया जाता है। किंडरगार्टन से ही तुलना का विष उसके मानस में घुलने लगता है। उच्च कक्षाओं तक पहुंचते-पहुंचते कोचिंग संस्थान, परीक्षण श्रृंखलाएं, कटऑफ और रैंक उसकी संपूर्ण चेतना पर अधिकार कर लेते हैं। आज नीट, संयुक्त प्रवेश परीक्षा, केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा, संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, अभियांत्रिकी योग्यता परीक्षा और प्रबंधन प्रवेश परीक्षा जैसी परीक्षाएं युवाओं के जीवन का केंद्रबिंदु बन चुकी हैं। करोड़ों विद्यार्थी इन परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं, किंतु अवसर सीमित हैं। उदाहरणस्वरूप नीट में लाखों विद्यार्थी परीक्षा देते हैं, जबकि एमबीबीएस सीटों की संख्या अत्यंत सीमित है। परिणामस्वरूप असंख्य युवाओं के हिस्से निराशा, अवसाद और आत्मग्लानि आती है। अनेक विद्यार्थी वर्षों तक ‘विराम वर्ष’ लेकर तैयारी करते रहते हैं। यह संघर्ष अब केवल शैक्षणिक नहीं रह गया, बल्कि मानसिक, आर्थिक और सामाजिक त्रासदी का रूप धारण कर चुका है। सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि शिक्षा के इस तीव्र बाजारीकरण ने नैतिकता को हाशिये पर धकेल दिया है।-सिकंदर बंसल

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