कोरोना वैश्विक महामारी का खौफ, तनाव और मौत का भय आज भी हम महसूस करते हैं, लेकिन इबोला वायरस ने नए ‘स्वास्थ्य आतंकवाद’ का भाव पैदा कर दिया है। अब इबोला सिर्फ कांगो, युगांडा और दक्षिणी सूडान तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि 10 अन्य अफ्रीकी देश संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। अकेले कांगो में ही करीब 200 मौतें हो चुकी हैं। मौत का कुल आंकड़ा अभी तक 250 के करीब बताया जा रहा है और करीब 1000 लोग संदिग्ध मरीज बताए जा रहे हैं। ये आंकड़े सरकारी हैं, हकीकत नहीं हैं, क्योंकि संदिग्ध मरीजों में से कितने स्वस्थ हो गए हैं अथवा कितनों की मौत हो चुकी है, इसका कोई भी डाटा सामने नहीं है। इस त्रासद स्थिति से पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला वायरस और संक्रमण को ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित कर दिया था। भय, तनाव, असहाय स्थितियां इसलिए भी हैं, क्योंकि अभी तक इबोला ‘लाइलाज’ है। दुनिया में एक भी टीका या गोली अथवा कैप्सूल ऐसा नहीं है, जो इबोला का इलाज कर सके, लिहाजा इस संक्रमण से मौत की संभावनाएं 25-80 फीसदी तक हैं, यह विशेषज्ञ चिकित्सकों का मानना है। लिहाजा हम मौजूदा दौर को आदमी का ‘मृत्यु-काल’ मानते हैं। हालांकि सीरम इंस्टीट्यूट, पुणे और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी संयुक्त रूप से इबोला के टीके पर प्रयोग कर रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि आगामी 6 माह में एक कारगर टीका विश्व-बाजार में होगा। सीरम और ऑक्सफोर्ड यूनि. ने कोरोना के टीके ‘कोविशील्ड’ का व्यापक स्तर पर उत्पादन किया, नतीजतन करोड़ों मरीज स्वस्थ हुए और अंतत: कोरोना गायब हो सका। उस टीके का आविष्कार ऑक्सफोर्ड ने किया था, लेकिन सीरम ने उसे विश्व स्तर पर उत्पादित किया।

बहरहाल अब रूस का भी दावा है कि उसके विशेषज्ञ डॉक्टर और शोधकर्ता भी इबोला के टीके पर काम कर रहे हैं। बहुत जल्द इबोला का टीका बाजार में आ सकता है! इबोला वायरस और संक्रमण के अधिकतर लक्षण एक-समान लगते हैं। तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, त्वचा पर चकत्ते, उल्टी, दस्त, थकान, बेहद कमजोरी, गले में खराश आदि इबोला वायरस के भी शुरुआती लक्षण हैं। आंख, नाक, कान या मल-मूत्र के रास्ते आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव होना भी महत्वपूर्ण लक्षण है। इबोला से संक्रमित जानवरों (चमगादड़ या बंदर) का मांस खाने से भी यह संक्रमण फैलता है। इसका संक्रमण इतना भयावह है कि यूरोपीय देशों, अमरीका, भारत आदि को ‘हाई अलर्ट’ घोषित और लागू करना पड़ा है। कनाडा ने तो कुछ समय के लिए वीजा जारी करने पर ही रोक लगा दी है। हालांकि भारत में अभी तक इबोला संक्रमण का एक भी मामला सामने नहीं आया है, लेकिन हवाई अड्डों पर विशेष जांच और निगरानी जारी है। संक्रमण के लक्षण पाए जाने के बाद ‘आइसोलेशन’ (अलग-थलग रखना) का प्रोटोकॉल भी शुरू कर दिया गया है। अफ्रीकी देशों में ही तीन बार इबोला वायरस का संक्रमण फैल चुका है, जिनमें 11,000 से अधिक मौतें हुईं। 1976 से यह वायरस महसूस किया जा रहा है, लेकिन देश घातक, संहारक हथियार तो खरीद कर जमा कर सकते हैं, लेकिन इबोला-रोधी टीके पर आज तक अनुसंधान निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाया, यह भी त्रासद विडंबना ही है। समस्या यह है कि कांगो, युगांडा, सूडान सरीखे देशों में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा बेहद सीमित है, लिहाजा अस्पताल इबोला के संक्रमित या संदिग्ध मरीजों से पटे हुए हैं। कई अस्पतालों में मरीजों के भागने की खबरें भी सामने आई हैं, क्योंकि अस्पतालों में पर्याप्त, उचित, संतोषजनक इलाज ही उपलब्ध नहीं था। गौरतलब यह है कि इबोला वायरस किसी एक अंग तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को कमजोर करता है। इसके मुख्य निशाने लिवर, गुर्दे (किडनी), फेफड़े और रक्त वाहिकाएं आदि हैं। बहरहाल केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने एक उच्चस्तरीय बैठक में इबोला के खतरों पर विमर्श किया। भारत सरकार ने परामर्श जारी किया है कि अफ्रीकी देशों की यात्रा से बचें। यदि बहुत जरूरी है, तो स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों और नियमों का सख्ती से पालन करें। यदि ऐसा बचाव जारी रहेगा, तो देश एक और महामारी से बच सकेगा। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस बीमारी का फिलहाल कोई इलाज नहीं है। वैज्ञानिकों को प्राथमिकता के साथ इस रोग का इलाज ढूंढना होगा। केंद्र सरकार को इसके लिए अलग से बजट की व्यवस्था करनी होगी। स्वास्थ्य से जुड़े मसलों के मामले में तेजी से काम होना चाहिए।

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