डेस्क: हर साल विश्व पर्यावरण दिवस 2026  दुनिया को पर्यावरण की सुरक्षा और बेहतर जीवन-स्थितियों को बढ़ावा देने के महत्व की याद दिलाता है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के मकसद से शुरू की गई अलग-अलग पहलों और अभियानों को उजागर करने में मदद करता है। सांस से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामलों और फेफड़ों की सेहत बिगड़ने के कारण बच्चों और बुज़ुर्गों की गिरती सेहत को देखते हुए, प्रदूषण को अब स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर संकट माना जा रहा है। ‘पृथ्वी दिवस’ (Earth Day) पर पूरा देश साफ़ हवा, बेहतर जीवन और जलवायु से जुड़ी मज़बूत नीतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करेगा। एक स्वस्थ भारत बनाने की दिशा में शुरुआती कदम फेफड़ों पर वायु प्रदूषण के असर को समझने से ही शुरू होते हैं।

फेफड़ों की सेहत पर वायु प्रदूषण का असर

इंसानी शरीर के फेफड़े कुदरती एयर फ़िल्टर की तरह काम करते हैं। इसका मतलब है कि जब हम जिस हवा में सांस लेते हैं, वह बहुत ज़्यादा प्रदूषित होती है, तो यह नुकसानदायक हो सकती है।

अस्थमा: दिल्ली के लोगों और खासकर बच्चों में, इसके कारण अस्थमा के मामले बढ़ जाते हैं। प्रदूषण का स्तर ज़्यादा होने पर अस्थमा का दौरा भी पड़ सकता है। खांसी और सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण हो सकते हैं।

क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ (COPD): ज़हरीले पदार्थों के संपर्क में आने से फेफड़ों को लंबे समय तक नुकसान पहुंचता है, जिसे अक्सर ‘सांस की समस्या’ कहा जाता है। जो लोग बहुत ज़्यादा प्रदूषित शहरों में रहते हैं, उन्हें इसका ज़्यादा ख़तरा होता है।

सांस से जुड़ी बीमारियां: इससे सांस से जुड़ी कई बीमारियां, निमोनिया और ब्रोंकाइटिस जैसे फेफड़ों के संक्रमण हो सकते हैं।

फेफड़ों का कैंसर: प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का ख़तरा बढ़ सकता है। यह एक बहुत गंभीर बीमारी है, क्योंकि नियमित जांच से कैंसर को रोका नहीं जा सकता।

बच्चों की सांस लेने की क्षमता कम होना: अगर कोई बच्चा प्रदूषण वाले शहर में रहता है, तो उसके सांस लेने वाले अंगों का विकास सही रफ़्तार से नहीं हो पाता, इन स्वास्थ्य समस्याओं के कारण कम उम्र में ही सांस लेने में तकलीफ़ हो सकती है। बच्चों को एलर्जी होने का भी बहुत ज़्यादा ख़तरा होता है।

फेफड़ों की सेहत पर जलवायु परिवर्तन का असर

जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर लोगों के फेफड़ों की सेहत पर असर डालता है। फेफड़ों की सेहत से जुड़ी कई ऐसी समस्याएं भी हो सकती हैं जिन पर इन हालात में ध्यान नहीं जाता। तापमान बढ़ने से ओज़ोन प्रदूषण होता है, जंगल की आग का धुआ सांस की समस्याओं को बढ़ाता है, तूफ़ान से धूल भरी आंधी से पराग कणों (pollen count) की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे लोगों को गंभीर एलर्जी हो सकती है। इसलिए, जलवायु के लिए कदम उठाना और पर्यावरण की सुरक्षा करना इंसानी सेहत और सांस की समस्याओं से जुड़ा हुआ है।

प्रदूषण की वजह से फेफड़ों की समस्याओं के लक्षण

अगर किसी व्यक्ति को खांसी, सांस लेने में दिक्कत, सीने में बेचैनी, एलर्जी, सांस लेते समय घरघराहट की आवाज़ आना, छींक आना, थकान महसूस होना और स्टैमिना कम होने जैसी समस्याएं हों, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। हालांकि, कई लोग शुरुआत में ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो सकते हैं।

इस प्रदूषित माहौल में फेफड़ों को सुरक्षित रखने के उपाय

दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए ऐसे मास्क पहनने की सलाह दी जाती है जो हवा में मौजूद बारीक कणों (पार्टिकुलेट मैटर) को रोक सकें। बाहर आने-जाने या एक्सरसाइज़ करते समय N95 मास्क आपको सुरक्षित रखते हैं। बाहर कोई गतिविधि करने की योजना बनाने से पहले एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) ज़रूर देखें। जब प्रदूषण का स्तर ज़्यादा हो, तो बाहर जाने या एक्सरसाइज़ करने से बचें। सुनिश्चित करें कि आपके घर के अंदर का माहौल सुरक्षित हो। एयर प्यूरीफायर घर के अंदर की हवा को साफ रखते हैं। नियमित रूप से पानी पीने से गले में सूखापन होने से बचा जा सकता है। कई प्राकृतिक उपाय आपके शरीर को प्रदूषण से बचा सकते हैं। विटामिन C से भरपूर चीज़ें, जैसे खट्टे फल, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां और बादाम जैसे नट्स, फायदेमंद हो सकते हैं।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी घरेलू नुस्खों और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. यह किसी भी तरह से चिकित्सा सलाह (Medical Advice) का विकल्प नहीं है. बालों या त्वचा से जुड़ी किसी भी समस्या के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर या डर्मेटोलॉजिस्ट की सलाह अवश्य लें. किसी भी घरेलू नुस्खे को अपनाने से पहले अपनी सुविधा और एलर्जी की स्थिति को ध्यान में रखें

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