बेशक राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान में ‘कयामत की रात’ का फैसला वापस ले लिया, लेकिन यही संभावित था, क्योंकि ट्रम्प ‘अस्थिर’ दिमाग के नेता हैं। ईरान युद्ध का एक अमानवीय पक्ष यह भी रहा है कि भारतीय नाविकों के लिए हरेक दिन ‘कयामत’ साबित हो रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग के आसपास अथवा ओमान तट के करीब अमरीकी सेना ने उन जहाजों पर भी मिसाइल हमले किए हैं, जिन पर भारतीय नाविक सवार थे और अन्य भारतीय चालक दल के कामगार भी मौजूद थे। बेशक जहाज होर्मुज पर ईरानी सेना की नाफरमानी करे अथवा अमरीकी नाकेबंदी को नजरअंदाज करे, हर स्थिति में ‘मौत’ निश्चित है। अमरीकी हमलों में अभी तक कुल 7 नाविकों की हत्या की गई है। यकीनन यह भारत-अमरीका की रणनीतिक साझेदारी का घोर उल्लंघन है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को धता बताने वाला ‘युद्ध अपराध’ भी है। भारत के प्रशिक्षित मानव संसाधनों को नष्ट करना भी है। यह खतरा भारत ही नहीं, यूरोप, एशिया के वे देश भी झेल रहे हैं, जिनके जहाज तेल, गैस, खाद, मशीनरी, खाद्य एवं अन्य रोजमर्रा की सामग्री आदि लेकर होर्मुज-ओमान से गुजरने को बाध्य हैं। हालांकि भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने दिल्ली में अमरीकी चार्ज डी अफेयर्स (एक किस्म का राजदूत) को तलब कर कारोबारी जहाजों और नागरिक ढांचे पर हमले तुरंत बंद करने को कहा है। भारत ने कड़ा राजनयिक विरोध भी दर्ज कराया है, लेकिन अमरीका ऐसी फटकार, सख्त रवैये की परवाह कहां करता है? वह अपनी सुविधा के मुताबिक कानूनों की व्याख्या करता है और उन्हें मानता है। ‘रणनीतिक साझेदारी’ दो खूबसूरत शब्द हैं, लेकिन अमरीका उनके मर्म को नहीं जानता। केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय ने खुलासा किया है कि 13 भारतीय ध्वज वाले जहाज और 562 भारतीय नाविक अब भी होर्मुज क्षेत्र में मौजूद हैं। बल्कि वे फंसे हुए हैं। पूरे खाड़ी क्षेत्र में 18,000 से अधिक भारतीय नाविक काम कर रहे हैं।

वे दूसरे देशों के जहाजों पर भी तैनात हैं। ऐसे में युद्ध के बढऩे से या अमरीका-ईरान के आपसी तनाव के मद्देनजर भारत के समुद्री और ऊर्जा-हितों पर भी असर पड़ता है। दरअसल जब से ईरान युद्ध भडक़ा है, तब से करीब 20,000 नाविक, अधिकतर भारतीय नाविक, होर्मुज के वैश्विक जलमार्ग के आसपास फंसे हैं। उनमें से कई ऐसे बड़े जहाज हैं, जिन पर भोजन, पानी आदि खत्म होने को हैं और नाविकों का मनोबल भी खतरनाक रूप से टूटता जा रहा है। अब भी 1600 से अधिक जहाज फारस और ओमान की खाड़ी में फंसे हुए हैं। उन पर करोड़ों रुपए का तेल, गैस, अन्य सामान लदे हैं। वे कब तक समंदर में खड़े रह सकते हैं? ऐसे में वैश्विक समुद्री व्यापार का क्या होगा? जहाजों की मालिक कंपनियां ‘हत्यारे हमलों’ के बीच कारोबार क्यों करेंगी? दुनिया में जो 20-25 फीसदी तेल, गैस, खाद, अन्य सामान इस ‘संकरे जलमार्ग’ से गुजरता था, उसका क्या होगा और देश घोर संकट झेलने को विवश होंगे? इन तमाम संदर्भों में राष्ट्रपति ट्रम्प को ‘वैश्विक अस्थिरता का खलनायक’ मानना चाहिए। कुछ हद तक ईरान की जिद और होर्मुज को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति का ‘प्रतिनायक’ भी माना जा सकता है। अमरीका-इजरायल के थोपे हुए युद्ध ने ईरान को ऐसी दुरावस्था में झोंक दिया है कि वहां के लोग ईएमआई पर रोटी खाने को अभिशप्त हैं। ईरान में 73 फीसदी महंगाई बढ़ चुकी है। ईरानी ईएमआई पर ही पुराना, घरेलू सामान खरीद रहे हैं। वहां की जिंदगी कर्ज लेकर जीनी पड़ रही है। करीब 20 लाख लोग बेरोजगार हो चुके हैं। अब तो राष्ट्रपति ट्रम्प के बयान से ही स्पष्ट है कि अमरीका वेनेजुएला की तरह ईरान के तेल-गैस पर कब्जा करना चाहता था, लिहाजा उसी लुटेरे मंसूबों के साथ युद्ध थोपा था। कुछ आंकड़े सामने आए हैं कि अमरीका ने अप्रैल में ईरान का 16.72 करोड़ बैरल तेल बेचा, जिससे 17.1 अरब डॉलर कमाए। पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से 36 अरब डॉलर की कमाई की। ईरान ने इतना कुछ कैसे लुट जाने दिया? राष्ट्रपति ट्रम्प यह युद्ध खत्म करना क्यों चाहेंगे, क्योंकि यह तो डॉलर छापने की मशीन साबित हो रहा है? अब फिर ट्रम्प ने दावा किया है कि उच्चतम स्तर पर समझौते की सहमति बन गई है। शीघ्र ही किसी तीसरे देश में मसविदे पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। क्या ट्रम्प सच बोल रहे हैं?

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