जबलपुर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर युगलपीठ ने पॉक्सो एक्ट के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए बड़ा आदेश दिया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस ए के सिंह की बेंच ने उम्रकैद की सजा काट रहे डिंडौरी निवासी मुकेश पेंड्रा को तुरंत दोषमुक्त कर दिया।
कोर्ट ने इस मामले को नाबालिग से अपराध नहीं, बल्कि ‘दो युवा दिलों के बीच हार्मोन का जोश और आकर्षण’ माना। दरअसल, अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि घटना के समय लड़की नाबालिग थी।
उम्र के गणित पर उलझ गया सरकारी पक्ष
सरकारी वकील ने दलील दी थी कि 10वीं की मार्कशीट और साल 2018 में बने जन्म प्रमाण पत्र के मुताबिक लड़की नाबालिग थी। आरोपी की डीएनए रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि जन्म प्रमाण पत्र असली घटना के 11 साल बाद बना था, इसलिए उसकी कोई कानूनी अहमियत नहीं है।
मां की गवाही और फेल होने का रिकॉर्ड बना आधार
अपीलकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि लड़की की मां के मुताबिक, उसने अपनी बेटी का दाखिला साल 2012 में पहली कक्षा में कराया था, तब उसकी उम्र 7-8 साल थी। इसके बाद लड़की 12वीं पास करने से पहले दो बार फेल भी हुई। कोर्ट ने कहा कि बच्चे को जन्म देने वाली मां का बयान सबसे अहम सबूत है।
- एडमिशन की टाइमलाइन: साल 2012 में 7-8 साल की उम्र में पहली कक्षा में दाखिला हुआ।
- पढ़ाई का रिकॉर्ड: 12वीं पास करने के दौरान लड़की दो बार फेल हुई।
- उम्र की गणना: मां के बयान और स्कूल रिकॉर्ड के हिसाब से पीड़िता का जन्म साल 2005 बैठता है।
- घटना का वक्त: फरवरी 2024 में हुई इस घटना के वक्त लड़की की उम्र 18 साल से अधिक (बालिग) थी।
- पीड़िता का बयान: लड़की ने खुद माना कि वह अपनी मर्जी से मुकेश के साथ गई थी और आपसी सहमति से रिश्ते में थी।
हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी
हाईकोर्ट की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि जब मां के इस बयान का सरकारी पक्ष ने विरोध नहीं किया, तो इसे ही सच माना जाएगा। कोर्ट ने माना कि दोनों बालिग थे और आपसी सहमति से साथ थे, जिसके बाद सजा निरस्त कर दी गई।



















