राजस्थान पुलिस बेड़े के प्रशासनिक कामकाज, आधिकारिक जांच रिपोर्टों और थानों के दैनिक रिकॉर्ड्स को लेकर राज्य सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील नीतिगत निर्णय लिया है। कार्यालय अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (विविध प्रकोष्ठ एवं एससी) राजस्थान, जयपुर द्वारा जारी एक नए आदेश के अनुसार, अब पुलिस विभाग से जुड़े किसी भी प्रकार के सरकारी कामकाज, कागजातों, एफआईआर (FIR) और पत्राचार में ‘दलित’ शब्द का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। गृह विभाग के उप शासन सचिव पुलिस के पत्र और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के पुराने निर्देशों की पालना में पुलिस अधीक्षक ज्ञानचन्द्र यादव द्वारा यह सर्कुलर जारी किया गया है।

इस नए आदेश के तहत अब सभी थानों, पुलिस अधीक्षकों और आयुक्तालयों के स्तर पर केवल संवैधानिक शब्दावली यानी ‘अनुसूचित जाति’ शब्द का ही प्रयोग बोलना और लिखना सुनिश्चित किया जाएगा। इस बदलाव का सीधा मानवीय और सामाजिक असर प्रदेश के उन लाखों नागरिकों पर पड़ेगा जो पुलिस थानों में अपनी शिकायतों के निस्तारण के लिए प्रशासनिक दस्तावेजों का हिस्सा बनते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पुराने पत्रों का हवाला

पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी इस आदेश पत्र में स्पष्ट रूप से पुरानी कानूनी कड़ियों और न्यायिक फैसलों का संदर्भ दिया गया है। आदेश के तहत, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा 15 March 2015 को जारी किए गए मूल पत्र और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की निरंतर पालना सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।

इसके अलावा, गृह ग्रुप-13 विभाग, राजस्थान शासन सचिवालय के पत्र के संदर्भ में भी इस व्यवस्था को राज्य स्तर पर और अधिक कड़ाई से लागू करने की आवश्यकता जताई गई थी।

सभी प्रमाण पत्रों में लागू होगा नियम

इस नए सर्कुलर के तहत बदलाव की प्रक्रिया केवल साधारण पत्राचार तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पुलिस विभाग के पूरे प्रशासनिक ढांचे के दस्तावेजों को नए सिरे से अपडेट किया जाएगा। पुलिस अधीक्षक ज्ञानचन्द्र यादव द्वारा जारी पत्र के अनुसार, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के आलोक में सरकारी मामलों और कागजातों में इस शब्दावली के उपयोग को पूर्णतः प्रभाव से रोका गया है। अनुसूचित जाति के संदर्भों को दर्शाने के लिए सभी प्रकार के विभागीय अभिलेखों, विभिन्न फॉर्म-नंबरों, मानपत्रों और व्यावसायिक प्रमाण पत्रों आदि के लिए हिंदी भाषा में ‘अनुसूचित जाति’ और अंग्रेजी भाषा में ‘Scheduled Caste’ शब्द का ही प्रयोग अनिवार्य किया गया है। इसके साथ ही, अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी इसका केवल उपयुक्त कानूनी अनुवाद ही उपयोग में लाया जा सकेगा।

थानों से लेकर अधिकारियों को सख्त हिदायतें

02 July 2026 को जारी किए गए इस आदेश की प्रतियां राजस्थान पुलिस के तमाम शीर्ष अधिकारियों और फील्ड कमानों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भिजवा दी गई हैं। इसमें समस्त महानिदेशक पुलिस (रेल, राज्य) एवं पुलिस आयुक्त जयपुर व जोधपुर के साथ-साथ राज्य के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों (SP) और पुलिस उपायुक्तों (DCP) को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी थानों और कार्यालयों में इसकी पालना शत-प्रतिशत सुनिश्चित कराएं।

इसी क्रम में कार्यालय पुलिस उपायुक्त (उत्तर) जयपुर ने भी 2 July को ही आदेश की प्रतिलिपि अतिरिक्त पुलिस उपायुक्तों, सहायक पुलिस आयुक्तों और समस्त थानाधिकारियों (उत्तर) जयपुर को तामील कराकर मैदानी स्तर पर इसकी तुरंत पालना शुरू करने के निर्देश दे दिए हैं।

आम जनता और पुलिसिंग पर क्या असर?

इस नीतिगत फैसले का सबसे बड़ा सामाजिक पहलू यह है कि पुलिस थानों में दर्ज होने वाले मुकदमों, केस डायरियों और आधिकारिक जांच रिपोर्टों में अब किसी भी व्यक्ति की जातिगत पहचान या वर्ग विशेष को संबोधित करते समय केवल संवैधानिक और विधिक शब्दों का ही सहारा लिया जाएगा।

पुलिस के इस कदम से थानों के भीतर होने वाले रोजमर्रा के मौखिक और लिखित संवाद में अधिक शालीनता, संवेदनशीलता और विधिक शुद्धता देखने को मिलेगी। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के भाषाई सुधारों से सरकारी व्यवस्था के प्रति आम नागरिकों का सम्मान और विश्वास और अधिक मजबूत होता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर व्यक्ति की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों के सम्मान से जुड़ा हुआ विषय है।

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