मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता की आस को फिर पलीता लग गया। यह काम किसी और ने नहीं, बल्कि उन लोगों ने ही किया है, जिनसे शांति और स्थिरता की समझदारी की उम्मीद लगाई जा रही थी। अमरीकी  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, ईरानी नेतृत्व को सनकी मानते हैं। 
ट्रम्प के बारे में भी शेष विश्व की कमोबेश यही राय है। इसराईल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की छवि भी ऐसी ही है। दरअसल ये तीनों ही मिल कर शेष विश्व की व्यवस्था को अपनी सनक का बंधक बनाते दिख रहे हैं। युद्ध विराम के बीच भी तनातनी के बावजूद जिस तरह अमरीका और ईरान में 60 दिन का शांति समझौता हुआ तथा उसे स्थायी बनाने को ले कर बातचीत शुरू हुई, उससे विश्व व्यवस्था बहाल होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन अचानक फिर एक-दूसरे पर हमले शुरू हो गए हैं। 

युद्ध के लिए किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना आसान नहीं होता, लेकिन कोई कम दोषी होता है, तो कोई ज्यादा। अक्सर संवाद के जरिए समस्या के समाधान का रास्ता बंद हो जाने पर ही संघर्ष की शुरूआत होती है, लेकिन अमरीका और इसराईल ने 28 फरवरी को ईरान पर तब हमला बोल दिया था, जब पहले दौर में कुछ मुद्दों पर सहमति के बाद वार्ता का दूसरा दौर तय हो गया था। ईरान पर हमले के पक्ष में ट्रम्प और नेतन्याहू ने जो तर्क दिए, वे भी उनके समर्थक देशों के अलावा शायद ही किसी और के गले उतरे हों। पहले ही दिन सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई समेत तीन दर्जन से ज्यादा वरिष्ठ नेताओं-पदाधिकारियों को मार डालने तथा बाद में ईरान की सैन्य शक्ति लगभग समाप्त करने के दावों के बावजूद 7 अप्रैल को युद्ध विराम बताता है कि शक्तिशाली अमरीका और इसराईल वांछित परिणाम पाने में विफल रहे। 
इसराईल ने तो युद्ध विराम से असहमति जताते हुए लेबनान पर हमले भी जारी रखे। तनातनी के बीचों-बीच तीनों ही पक्षों में छिटपुट टकराव जारी रहा, पर पिछले महीने शांति समझौते पर हस्ताक्षर से उम्मीद जगी थी कि युद्धोन्माद खत्म होगा और ऊर्जा संकट के चलते आर्थिक हिचकोले झेल रही विश्व व्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट आएगी। हालांकि ट्रम्प अपनी आदत के मुताबिक बीच-बीच में धमकी और चेतावनी देते रहे। ट्रम्प ने यहां तक कह दिया कि उन्होंने ईरान को ‘एक हफ्ते की छुट्टी’ दी है। उनका आशय ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई के अंतिम संस्कार से था, जो 28 फरवरी को अमरीकी-इसराईली हमले में मारे जाने के बाद से लंबित था। यह बहुत सभ्य टिप्पणी नहीं थी—और सच यह भी है कि नौ जुलाई को अंतिम संस्कार की रस्में पूरी होने से पहले ही 7 जुलाई को ईरान पर फिर हमले शुरू हो गए। खामेनेई के जनाजे से उनके उत्तराधिकारी बने बेटे मोजतबा सुरक्षा कारणों से दूर ही रहे। जाहिर है, जनाजे में ट्रम्प विरोधी नारे भी लगे। इसीलिए अब ट्रम्प खुद को ईरान का सबसे बड़ा ‘टारगेट’ मानते हुए अपनी सुरक्षा में अत्यधिक सतर्कता बरत रहे हैं। 

ट्रम्प ने शांति समझौता तोड़ फिर हमलों के लिए ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन कमर्शियल जहाजों पर फायरिंग को कारण बताया है। बेशक जब शांति समझौता हो चुका था, जिस पर अमल का रोडमैप 60 दिनों में तय करने के लिए वार्ताएं जारी थीं, तब ईरान को भी होर्मुज में भड़काने वाली इस कार्रवाई से बाज आना चाहिए था, पर क्या ट्रम्प ऐसे किसी मौके की तलाश में ही थे? बिना तैयारी के तो वैसे जबरदस्त हमले तत्काल नहीं हो सकते, जैसे किए गए। दो दिन में ईरान के 170 से अधिक  सैन्य या उससे जुड़े ठिकानों पर हमले किए गए। बेशक ईरान ने भी खाड़ी में स्थित कुवैत, कतर और बहरीन सरीखे अमरीका के मित्र देशों पर पलटवार करने में देर नहीं लगाई। उसी दौरान ईरान को तेल बेचने के लिए दी गई अमेरिकी अनुमति भी रद्द करने की खबर आई।

ऐसे में यह संदेह होता है कि क्या शांति वार्ता से मनमाफिक परिणाम न निकलने पर ट्रम्प ने और दबाव बढ़ाने के लिए हमलों का विकल्प चुना? आप सोच सकते हैं कि युद्ध कोई खेल नहीं, जिसे मनमाफिक समझौते के लिए दावपेंच की तरह इस्तेमाल किया जाए, पर महाशक्तियों के लिए तो युद्ध खेल भी है और मुनाफे का कारोबार भी। मूलत: मुनाफाखोर कारोबारी ट्रम्प ने खुद माना कि जब विश्व ऊर्जा खपत के 20-22 प्रतिशत हिस्से के आयात का समुद्री मार्ग होर्मुज बंद था, तब अमरीका ने चोरी-चोरी भारी मात्रा में तेल वहां से निकाला।

जाहिर है, वह तेल ऊंचे दामों पर बेचा भी गया। नेतन्याहू का ‘ग्रेटर इसराईल’ का एजेंडा भी किसी से छिपा नहीं है। ईरान के कट्टरपंथी नेतृत्व के मंसूबे भी विश्व शांति के तो हरगिज नहीं। यह आईने की तरह साफ हो गया है कि तीनों ही संबंधित पक्ष अपने-अपने निहित स्वार्थों में उलझे हैं। उनका न विश्व शांति से कोई सरोकार है और न ही न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था से। इसलिए समय और समझ, दोनों का तकाजा है कि विश्व व्यवस्था को इनका बंधक बनने से बचाने के लिए शेष विश्व एकजुट हो कर मुखर हो। बेशक कुछ छोटे देशों ने इस युद्धोन्माद के बीच शांति-समझौता वार्ताओं की पहल की, लेकिन शायद वे कोई नैतिक या कूटनीतिक दबाव बनाने की स्थिति में नहीं रहे। इसलिए अब भारत, चीन, रूस, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों को समान विचार वाले अन्य देशों के साथ मिल कर अमरीका-इसराईल-ईरान पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वे संवाद के जरिए आपसी विवादों का मनमाना नहीं, तर्कसम्मत और न्यायपूर्ण समाधान निकालें, क्योंकि उन्हें अपने निहित स्वार्थों और सनक के लिए शेष विश्व की शांति और अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने नहीं दिया जा सकता।-राज कुमार सिंह

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