22 जनवरी, 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का नेतृत्व करते हैं। 7 जून, 2026 को राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए नकद, सोना और चांदी के चढ़ावे में कथित गबन का मामला सामने आता है। उत्तर प्रदेश सरकार तत्काल विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) गठित करती है। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के 2 सदस्य इस्तीफा दे देते हैं और नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.ई.ओ.) की तलाश शुरू होती है। इस प्रकार सार्वजनिक जवाबदेही की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

फिर भी, राजनीतिक दृष्टि से ‘चंदा चोरी’ का प्रतीकात्मक महत्व चोरी की गई राशि से कहीं अधिक है। यह भाजपा के उस राजनीतिक आख्यान को चुनौती देता है, जिसमें राम मंदिर को नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया गया था। समर्थकों और विरोधियों के बीच यह प्रश्न उठ रहा है कि यदि भगवान राम को समॢपत चढ़ावा ही सुरक्षित नहीं है, तो शासन व्यवस्था पर कितना भरोसा किया जा सकता है? ऐसे में ‘चंदा चोरी’ के आरोप केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका राजनीतिक महत्व कहीं अधिक व्यापक है।उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह भाजपा के लिए सबसे गंभीर प्रतीकात्मक मुद्दा बन सकता है। यह विवाद सीधे भाजपा की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि की नैतिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसका असर न केवल 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव की दिशा भी प्रभावित हो सकती है। 

देश के 14 प्रधानमंत्रियों में से 8 इसी राज्य से रहे हैं। यदि उत्तर प्रदेश में भाजपा कमजोर पड़ती है तो इसका प्रभाव अन्य राज्यों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक रूप से विपक्ष ने इस मुद्दे को अपने अभियान का प्रमुख हथियार बनाने का निर्णय लिया है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ‘चंदा चोरी’ को भाजपा की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि को राजनीतिक बोझ में बदलने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, यह मतदान के रुझान को कितना प्रभावित करेगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। यदि विपक्ष इस मुद्दे को बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक, महंगाई और सत्ता-विरोधी माहौल जैसे मुद्दों से जोडऩे में सफल रहता है, तो इसका समग्र राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। 

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले ही ‘चंदा चोरी’ को अपने चुनाव अभियान का प्रमुख मुद्दा बना चुके हैं। उनका आरोप है, ‘मंदिर तो आपने बनवाया, लेकिन श्रद्धालुओं का चढ़ावा भी चुरा लिया। उसे तत्काल वापस किया जाए।’ यह आरोप भाजपा के लिए सहजता से खारिज करना आसान नहीं है, क्योंकि इससे बहस धार्मिक आस्था से हटकर ईमानदारी और नैतिकता पर केंद्रित हो जाती है। इससे समाजवादी पार्टी को हिंदू मतदाताओं तक पहुंच बनाने का अवसर भी मिलता है। 

उधर भाजपा का तर्क है कि राम मंदिर ट्रस्ट एक स्वतंत्र कानूनी संस्था है। यदि किसी व्यक्ति ने आपराधिक कृत्य किया है, तो उसके लिए पूरी पार्टी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पार्टी का कहना है कि दोषियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, ट्रस्ट के नेतृत्व में आवश्यक परिवर्तन किए गए हैं और विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए इस घटना का इस्तेमाल कर पवित्र धार्मिक परियोजना को बदनाम करने का प्रयास कर रहा है।

हालांकि, यदि यह मामला चुनावी मुद्दा बनता भी है, तब भी इसके भाजपा पर व्यापक राजनीतिक प्रभाव की संभावना सीमित दिखाई देती है। अधिकांश ङ्क्षहदू मतदाताओं के लिए राम मंदिर का निर्माण दशकों पुराने वादे की पूॢत है। ऐसे में केवल चोरी के आरोप उस भावनात्मक जुड़ाव को कमजोर करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। भारत में मतदान का व्यवहार अनेक कारकों से प्रभावित होता है-नेतृत्व, कल्याणकारी योजनाएं, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय परिस्थितियां, आॢथक स्थिति, रोजगार, कानून-व्यवस्था, स्थानीय प्रत्याशी तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता। कोई एक विवाद तभी निर्णायक बनता है, जब वह व्यापक जनधारणा का हिस्सा बन जाए। 

भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पाखंड  की धारणा बनना हो सकती है। मतदाता अक्सर विभिन्न दलों में भ्रष्टाचार के आरोपों को सहन कर लेते हैं, लेकिन वे उन नेताओं को आसानी से माफ नहीं करते, जो स्वयं जिन नैतिक मूल्यों का प्रचार करते हैं, उन पर खरे नहीं उतरते। यदि लोगों को यह आभास होता है कि अनियमितताओं पर पर्दा डाला जा रहा है, तो उनके मन में यह धारणा बन सकती है कि भाजपा भी अन्य दलों से अलग नहीं है। अब देखना यह होगा कि घटनाक्रम किस दिशा में आगे बढ़ता है। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा इस विवाद को कितनी प्रभावी ढंग से शुरुआती चरण में ही नियंत्रित कर पाते हैं, ‘चंदा चोरी’ के राजनीतिक अभियान की धार को कितनी कुंद कर पाते हैं और जनमत के विमर्श पर कितना नियंत्रण स्थापित कर पाते हैं। यह राह आसान नहीं होगी।– पूनम आई. कौशिश

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