सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर अभिजीत दीपके के आह्वान पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनशन आंदोलन करीब-करीब समाप्ति की ओर है. आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सोनम वांगचुक ने अनशन समाप्त कर दिया है. अभिजीत दीपके की तरफ से इंस्टाग्राम पर कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से एक पेज बनाया गया, जिसपर मिलियन में फॉलोअर आ गए. इसके बाद NEET समेत देशभर में तमाम नौकरियों और एंट्रेंस एग्जॉम के पेपर लीक के खिलाफ सख्त नियम बनाए जाने की मांग को लेकर अनशन आंदोलन शुरू किया गया है.
28 जून से राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन आंदोलन किया जा रहा है. इस आंदोलन की अगुवाई सोनम वांगचुक कर रहे हैं. वह 22 दिनों से अनशन पर हैं. हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से सरकार से उनकी सेहत का ध्यान रखने को कहा, जिसके बाद बिना यूनिफॉर्म में पहुंची पुलिस ने उन्हें धरना स्थल से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया है. इस आंदोलन में यूं तो कई डिमांड हैं, लेकिन पेपर लीक की तात्कालिक जवाबदेही तय करने के नाम पर शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हो रही है.
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के पास कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल लोगों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों की ओर से लाठीचार्ज किए जाने और आंसू गैस का इस्तेमाल किए जाने के बीच अफरा-तफरी की स्थिति उत्पन्न हो गई. संसद के निकट भारतीय रिजर्व बैंक के नजदीक सीजेपी के कम से कम सात प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. सुरक्षाबलों ने भारतीय रिजर्व बैंक के पास प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग किया. संसद के कुछ गेट कुछ देर के लिए बंद कर दिए गए. वहीं सुरक्षा बलों ने जब ताबड़तोड़ आंसू गैस के गोले दागे तो प्रदर्शनकारी तितर-बितर हो गए.
अन्ना बेदाग तो सोनम ‘दागदार’: सबसे बड़ा फर्क आंदोलन के दोनों चेहरों में ही है. जहां अन्ना हजारे पूरी तरह बेदाग हैं. उनके खिलाफ किसी प्रकार के गंभीर आरोप नहीं हैं. वह महाराष्ट्र में भी अलग-अलग मांगों को लेकर आंदोलन ही करते रहे हैं. दूसरी तरफ सोनम वांगचुक भले ही अन्ना हजारे के मुकाबले ज्यादा पढ़े लिखे हैं, लेकिन उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह के अलावा हत्या और धोखाधड़ी के गंभीर मुकदमे हैं. राष्ट्रद्रोह के आरोप में सोनम करीब आठ महीने की जेल काटकर कुछ ही महीने पहले बाहर आए हैं. ऐसे में जब सोनम वांगचुक के नाम पर आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश की गई तो वह आम लोगों के मन में अन्ना हजारे की तरह भरोसा नहीं जगा पाई.
अन्ना के मुकाबले सोनम में जिद्दीपन की कमी: याद होगा जब अन्ना हजारे से अनशन शुरू किया था तो शुरुआत में तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार ने भी इन्हें नजरअंदाज किया था. लेकिन अन्ना हजारे तनिक भी डगमगाए नहीं, बल्कि वो और भी ज्यादा मजबूती से अपन बात रखते दिखे. उन्होंने अधिकतम 13 दिनों के अनशन में ही जिस तरह से आक्रमकता दिखाई कि सरकार को उनसे बात करने के लिए झुकना पड़ा. वहीं दूसरी तरफ सोनम भले ही अन्ना के मुकाबले ज्यादा 22 दिनों से अनशन पर हैं, लेकिन उसमें उतना जोश नहीं दिखा. गौर करें तो जब सोनम के अनशन के 13वें दिन जाकर थोड़ी बहुत संख्या में लोग जुटने शुरू हुए.
प्लांड लगा सोनम वांगचुक का अनशन: सोनम वांगचुक को जब पुलिस उठाकर सफदरजंग ले गई तब उनकी पत्नी गीतांजलि ने कहा, ‘अगर राजनीतिक दलों के नेता अस्पताल में सोनम से मुलाकात करते हैं और उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि वे मानसून सत्र के दौरान शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही का मुद्दा उठाएंगे, तो वह कल अपना अनशन खत्म कर देंगे.’ उनके इस बयान के बाद आंदोलन के प्रति आकर्षित हो रहे लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठने लगे. क्योंकि सोनम लगातार कह रहे थे कि सरकार का कोई नुमाइंदा अनशन स्थल पर आए और उनकी मांगों को लेकर बातचीत करे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया तो वह अपने ही पुराने बयान से बैक होते दिखे. दूसरी तरफ अन्ना हजारे हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बनाने की मांग पर अड़े दिखे. उन्हें हिरासत में भी जब लिया गया तो भी वह उसी जोरदार तरीके से अपनी बात रखते दिखे.
एक ही तरकीब बार-बार नहीं चलती: अन्ना आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से राजनीतिक दल बनाकर दिल्ली में सरकारें चलाई. अरविंद केजरीवाल पर अपने लिए आलीशान मकान बनवाने, तमाम मंत्रियों पर जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लगे उसके बाद लोगों के बीच एक संदेह पैदा हुआ कि क्या सोनम वांगचुक को आगे कर अभिजीत दीपके वही दांव खेल रहे हैं. ऊपर से अभिजीत दीपके पहले से ही आम आदमी पार्टी के बड़े नेता मनीष सिसोदिया के करीबी भी रहे हैं.
देश में नहीं है 2011-12 वाले हालात: साल 2011-12 में देश में यूपीए की सरकार थी. सरकार के मंत्रियों पर 2जी घोटाला, कोयला घोटाला, कॉमन वेल्थ गेम्स घोटाला जैसे गंभीर आरोप लग रहे थे. ऐसे में माहौल में अन्ना हजारे की ओर से शुरू किया गया भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन आम लोगों में भरोसा जगा रहा था, लेकिन मौजूदा वक्त में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार पर भ्रष्टाचार के किसी प्रकार के आरोप नहीं हैं. सत्ताधारी बीजेपी लगातार राज्यों में भी चुनाव जीत रही है. ऐसे में देश में किसी आंदोलन के लिए माहौल बनाना आसान काम नहीं है.
आंदोलन फ्लॉप होने पर इसे जारी रखने का आह्वान
सोमवार को संसद मार्च कार्यक्रम पूरी तरह फ्लॉप होने पर सोनम वांगचुक ने कहा कि उनकी भूख हड़ताल आगे भी जारी रहेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपना अनशन तभी समाप्त करेंगे, जब सरकार शिक्षा व्यवस्था में हाल में हुई विफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार करेगी या राजनीतिक दलों के नेता उन्हें यह भरोसा देंगे कि इस मुद्दे को संसद में उठाया जाएगा.
सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक हस्तलिखित संदेश में वांगचुक ने लिखा, ‘आपमें से कई लोगों ने पूछा है कि मैं अपना अनशन कब समाप्त करूंगा. जैसा कि मैंने पहले अपने समर्थकों से कहा था, यदि सरकार शिक्षा व्यवस्था में हाल की विफलताओं, प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं की जिम्मेदारी 20 जुलाई तक स्वीकार करती है, तो मैं अपना अनशन समाप्त कर दूंगा.’ उन्होंने कहा कि यदि ऐसा नहीं होता है, तो उनका अनशन जारी रहेगा.
इस आंदोलन का मकसद था कि वह सोमवार से शुरू हो रहे संसद की कार्यवाही के दौरान वहां घेराव करेंगे और मजबूती से सरकार तक अपनी बात पहुंचाएंगे. हालांकि सोनम वांगचुक पहले से ही अस्पताल में हैं और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते संसद भवन तक पहुंचने की कोशिश कर रहे युवाओं को रास्ते में ही रोक दिया गया.



















