हरिद्वार: श्रावण मास का समय भगवान शिव को समर्पित होता है. श्रावण कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से भगवान शिव को समर्पित पवित्र कांवड़ यात्रा का आगाज विधिवत हो जाता है. साल 2026 में 30 जुलाई 2026 से कांवड़ यात्रा का शुभारंभ हो गया था. तीर्थ नगरी हरिद्वार को देवभूमि का मुख्य प्रवेश द्वार माना जाता है, जहां गंगा की पवित्र धारा के साथ शिव की ससुराल समेत अनेक सिद्ध पीठ मंदिर है.
हरिद्वार में गंगा के जल का सबसे अधिक महत्व है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हरिद्वार से गंगाजल कांवड़ में भरकर भोलेनाथ का अभिषेक करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है, इसलिए हर साल लाखों-करोड़ों शिवभक्त हरिद्वार से गंगा जल भरकर बोल-बम बम-बम के जयकारों के साथ अपनी यात्रा करते हैं.

कांवड़ जमीन पर रखना वर्जित
धार्मिक ग्रंथों और शास्त्र विधानों के अनुसार, कांवड़ यात्रा एक कठिन साधना है. कांवड़ में गंगाजल भरने के बाद यात्रा खंडित ना हो, इसके लिए शास्त्रों में कई नियमों का उल्लेख किया गया है. ज्यादा जानकारी देते हुए विद्वान ज्योतिषाचार्य पंडित प्रतीक मिश्रपुरी बताते हैं कि यात्रा करते हुए कांवड़ को हमेशा किसी ऊंचे टीले पर, पेड़ की मजबूत टहनियों या लकड़ी से निर्मित किसी स्टैंड के ऊपर रखा जाता है.

यात्रा के दौरान कांवड़ जमीन पर रखना वर्जित होता है. धार्मिक ग्रंथो के अनुसार, यात्रा के समय मन में पवित्रता, सात्विकता और ब्रह्मचर्य का पालन बेहद जरूरी होता है. दिन की शुरुआत में बिना स्नान किए कांवड़ को स्पर्श करने से यात्रा का कोई लाभ नहीं होता है. कांवड़ यात्रा के समय सभी प्रकार के नशे बीड़ी, सिगरेट, गुटका, पान मसाला, तंबाकू आदि का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित होता है.

गूलर पेड़ के नीचे से गुजरना वर्जित
ज्योतिषिय प्रतीक मिश्रपुरी बताते हैं कि कांवड़ यात्रा करते हुए रास्ते में कोई विघ्न ना आए, इसका ध्यान रखना जरूरी होता है. यात्रा के दौरान किसी महिला को स्पर्श करना, मन में गलत भावना होना और महिला की तरफ गलत भावना से देखना वर्जित होता है. कांवड़ यात्रा में कोई बाधा ना आए, इसके लिए शास्त्रों में कुछ विशेष जगह से नहीं निकलने के बारे में उल्लेख किया गया है. कांवड़ यात्रा करते समय यदि रास्ते में गूलर का पेड़ दिख जाए, तो उसके नीचे से निकलने पर यात्रा का फल शून्य हो जाता है. गूलर के फल में जीवाणु होते हैं, जो यात्रा को खंडित कर देते हैं. यदि अनजाने में कोई कांवड़िया गूलर के पेड़ के नीचे से निकल जाए, तो इसका उपाय बेहद ही आसान है. यात्रा करते हुए एक कदम पीछे रखें भोलेनाथ का मणि मन ध्यान करें और ‘ओम नमः शिवाय’ का जाप करते हुए अपनी यात्रा को फिर से करने पर इसका दोष भी समाप्त हो जाता है.

(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहां दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।

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