देश की राजनीति को हिलाकर रख देने वाले और सरकारों के तख्तापलट का कारण बने बहुचर्चित बोफोर्स तोप सौदा घोटाले में अब न्यायपालिका की तरफ से हमेशा के लिए पर्दा गिर गया है। सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 2005 के उस ऐतिहासिक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स (AB Bofors) के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल की याचिका पर आगे सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत के इस फैसले के साथ ही करीब चार दशक पुराने इस सियासी और कानूनी ड्रामे का अंतिम अध्याय भी बंद हो गया है।

अदालत ने क्यों बंद की फाइल?

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता ने याचिका में संशोधन के लिए चार सप्ताह का समय मांगा ताकि दिवंगत हो चुके श्रीचंद हिंदुजा और गोपीचंद हिंदुजा के नाम हटाए जा सकें तब पीठ ने सख्त रुख अपनाया। जस्टिस पारदीवाला ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि जब 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट प्रक्रिया रद्द कर चुका है और सीबीआई की अपील भी सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी है, तब इस मामले में अब क्या शेष बचता है?

गौरतलब है कि सीबीआई की मुख्य जांच में करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने पाया कि स्वीडिश अधिकारियों से प्राप्त दस्तावेज न तो मूल थे और न ही प्रमाणित। अदालत ने माना था कि बिना पुख्ता सबूतों के मुकदमा चलाना जनता के पैसे और समय की बर्बादी है।

बोफोर्स घोटाला: 1986 से 2026 तक का घटनाक्रम

करीब चार दशक पहले हुआ बोफोर्स तोप सौदा केवल एक रक्षा खरीद समझौता नहीं रहा, बल्कि इसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। 1986 में स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स से 155 मिमी हॉवित्जर तोपों की खरीद के लिए हुए समझौते के बाद उठे कथित कमीशन के आरोपों ने संसद से लेकर अदालतों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों तक लंबी कानूनी जंग को जन्म दिया। समय के साथ कई आरोपी दुनिया छोड़ गए, कई मामलों में अदालतों ने राहत दी और अंततः न्यायिक प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच गई।

24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच करीब 400 से अधिक 155 मिमी हॉवित्जर फील्ड गनों की आपूर्ति का समझौता हुआ। उस समय इसे भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में बड़ा कदम माना गया। लेकिन अगले ही वर्ष अप्रैल 1987 में स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट ने दावा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए कथित तौर पर भारी कमीशन दिया गया।

वर्षप्रमुख घटनाक्रम
24 मार्च 1986भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच 400 हॉविट्जर तोपों के लिए ₹1,437 करोड़ का समझौता।
अप्रैल 1987स्वीडिश रेडियो का खुलासा: सौदे के लिए भारतीय नेताओं और रक्षा अधिकारियों को दलाली (कमीशन) दी गई।
नवंबर 1989बोफोर्स विवाद के कारण लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा; राजीव गांधी सत्ता से बाहर।
22 जनवरी 1990सीबीआई ने आधिकारिक रूप से एफआईआर दर्ज की; स्विट्जरलैंड में खाते सीज किए गए।
29 जुलाई 1993इतालवी व्यापारी ओतावियो क्वात्रोची गिरफ्तारी से बचने के लिए भारत छोड़कर फरार।
31 मई 2005दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं और एबी बोफोर्स को सभी आपराधिक आरोपों से बरी किया।
नवंबर 2018सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अपील 4,522 दिनों की देरी के कारण खारिज की।
2026सुप्रीम कोर्ट ने बची हुई अंतिम निजी याचिका भी खारिज कर मामले का पूरी तरह पटाक्षेप किया।

रक्षा सौदों पर बोफोर्स का दूरगामी प्रभाव

बोफोर्स विवाद का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा; इसने भारतीय रक्षा खरीद प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया:

रक्षा खरीद नीति में सुधार: बोफोर्स कांड के बाद भारत में रक्षा सौदों के लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOP) और ‘डिफेंस प्रोक्योरमेंट मैनुअल’ की शुरुआत की गई।

सैनिक क्षमताओं पर असर: घोटाले के विवाद के चलते भारतीय सेना को दशकों तक नई तोपों की आपूर्ति से वंचित रहना पड़ा। बोफोर्स के बाद सेना में अगली बड़ी हॉविट्जर तोप (एम777 अल्ट्रा-लाइट हॉविट्जर और के9-वज्र) को शामिल होने में करीब तीन दशक का वक्त लग गया।

1999 का कारगिल युद्ध: विडंबना यह रही कि जिस तोप सौदे पर इतना विवाद हुआ, उसी बोफोर्स (155 मिमी हॉविट्जर) तोप ने 1999 के कारगिल युद्ध में उच्च हिमालयी चोटियों पर छिपे दुश्मनों के बंकरों को ध्वस्त करने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाई।

सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के साथ ही देश के सबसे लंबे और चर्चित राजनीतिक-कानूनी अध्यायों में से एक पर अंतिम विराम लग गया है।

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