भारत भी प्रलय और तबाही के कगार पर है। नेपाल में भी महाविनाश अब भी दस्तक दे रहा है। इसरो और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने अध्ययन किए हैं और उनकी रपटों के निष्कर्ष हैं कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में करीब 7500 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। उनमें से 189 झीलें ‘रेड जोन’ में हैं, क्योंकि ये कभी भी टूट-फूट कर ‘प्रलय’ मचा सकती हैं। तब तबाही निश्चित है। एक रपट यह भी है कि 491 सालों में 254 बार ग्लेशियर झीलें फट चुकी हैं। फिलहाल उत्तराखंड में ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है। अध्ययन में यह सामने आया है कि सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन की चोटियों पर हजारों छोटी-बड़ी झीलें हैं। सिर्फ लद्दाख क्षेत्र में ही 3219 ग्लेशियर झीलों की पहचान की जा चुकी है। कुल 2431 ग्लेशियर झीलें 10 हेक्टेयर से भी बड़ी हैं। घोर चिंता यह है कि एनडीएमए ने इन 189 झीलों को ‘अत्यधिक जोखिम’ की श्रेणी में रखा है। सवाल यह है कि क्या हमारे भू-वैज्ञानिक, विशेषज्ञ इन झीलों के ‘प्रलय’ से देश के संभावित हिस्सों को बचाने में सफल नहीं हो सकते? क्या अब पर्यावरण, जलवायु-परिवर्तन और वैश्विक गर्मी के असंतुलन बदला लेने की स्थिति में आ गए हैं? नेपाल के संदर्भ में भी चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने एक चेतावनी जारी की है कि आगामी 3 दिन (शुक्रवार समेत) खतरे से भरे हैं। ग्लेशियर झील में 30 लाख क्यूबिक मीटर पानी आने की संभावना है। यदि ऐसा हुआ, तो झील में दरार पडऩे का खतरा है, नतीजतन वह ‘प्रलयी सैलाब’ में तबदील हो सकता है। यानी नेपाल में खतरे और विनाश की घंटियां अब भी बज रही हैं। नेपाल छोटा-सा देश है, जिसकी कुल अर्थव्यवस्था 4.48 लाख करोड़ रुपए है।

मौजूदा जल-प्रलय ने नेपाल की करीब 1.25 लाख करोड़ रुपए की संपत्तियां तबाह कर दी हैं। सरकार ने फिलहाल यह आकलन किया है। शुक्रवार सुबह तक 469 मौतों की पुष्टि की जा चुकी है, क्योंकि इतने शव बरामद कर लिए गए हैं। मौत का यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। देश-विदेश के करीब 1500 लोग अब भी लापता हैं। भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, 288 भारतीयों के सुराग अभी तक नहीं मिले हैं। इस त्रासद घड़ी में विश्व बैंक ने 25 अरब रुपए की आर्थिक मदद की घोषणा की है। कुछ और देशों ने भी आर्थिक ऐलान किए हैं। भारत की सेना, एनडीआरएफ, एसएसबी आदि के जवान और डॉक्टर-नर्सिंग स्टाफ नेपाल को संकट से उबारने में संलग्न हैं। भारत लगातार राहत-सामग्रियों की भी आपूर्ति कर रहा है। बहरहाल हमारे सामने ग्लेशियर झीलों के अलावा, अल-नीनो, ग्लेशियर के निरंतर पिघलने, शहरी प्रदूषण और बीमारियां, कृषि-संकट आदि भी आसन्न तबाही और त्रासदियों की दस्तक दे रहे हैं। भारत कई जल-प्रलय झेल चुका है। जून, 2013 में केदारनाथ के ‘प्रलय’ और अलकनंदा-मंदाकिनी नदियों की बाढ़ में हजारों मौतें हो गई थीं। उसे ‘सबसे बड़ी त्रासदी’ करार दिया गया था। चमोली-ऋषि गंगा घाटी में ग्लेशियर फटा था, जिसमें 200 मौतें हुई थीं। केरलम् के वायनाड में भूस्खलन और मूसलाधार बारिश में न केवल 400 के करीब मौतें हुईं, बल्कि कई गांव भी तबाह हो गए। नामोनिशान भी नहीं बचा। भारत में चक्रवात, भूकंप, सैलाब आते रहे हैं, बादल भी फटते हैं, बिजली भी गिरती है, नतीजतन असंख्य मौतें होती रही हैं। हालांकि अब समय-पूर्व कुछ जानकारियां दी जाती हैं, चेतावनी भी जारी की जाती है, लोगों को सुरक्षित स्थानों तक भेजा जाता है, लिहाजा त्रासदियां कम हुई हैं, लेकिन खतरे आज भी बरकरार हैं। सवाल है कि आज हम कितना तैयार हैं? कितने सतर्क हैं? कितने संसाधन और नए शोध हैं, जो हमारी रक्षा कर सकते हैं? गौरतलब तो यह है कि एनडीएमए ने उत्तराखंड में ही चिह्नित 426 बड़ी ग्लेशियर झीलों में से 25 को ‘संवेदनशील’ और 13 झीलों को ‘अति संवेदनशील’ आंका है। इनमें भिलंगना घाटी में मौजूद ‘मसर ताल’ बेहद संवेदनशील बताई गई है। विनाश और त्रासदियों के लिए एक ही झील पर्याप्त है, लिहाजा हमें अभी से सतर्क होना चाहिए कि नदियों के किनारे निर्माण नहीं हों। मंदिर भी नदी किनारे न हों और सरकार को बाध्य किया जाए कि नदियों को आपस में जोडऩे का काम अब युद्धस्तर पर किया जाए।

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