गया. बिहार के गया जी में पितृपक्ष मेला चल रहा है और इस दौरान देश के कोने-कोने से तीर्थ यात्री यहां पहुंचकर अपने पितरों का पिंडदान कर रहे हैं. ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि 2 साल से कम उम्र के बच्चे जिनकी आकस्मिक मृत्यु या गर्भ में मृत्यु हो गई तो क्या ऐसे बच्चों का भी पिंडदान किया जाता है? गया जी विष्णुपद क्षेत्र के मंत्रालय वैदिक पाठशाला के पंडित राजा आचार्य ने इस सवाल का जवाब दिया.
वे बताते हैं कि जिस बच्चे की मौत कुंवारावस्था में हो गई है, या जिनके दांत नहीं हैं या जो गर्भ में पीड़ित हैं या कन्या अवस्था में हैं, उनका महालय श्राद्ध यानी पंचमी तिथि को श्राद्ध किया जाता है. बाल्यावस्था में शिशु या नवजात बच्चे की किसी कारणवश मृत्यु हो जाती है और उसका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हुआ है तो ऐसे बच्चों का अग्नि संस्कार नहीं किया जाता है और मिट्टी में दफनाया जाता है.
वो भी मोक्ष का अधिकारी हो
लेकिन अगर आप गया श्राद्ध करने आ रहे हैं या घर में किसी का श्राद्ध कर्म हो रहा है तो अपने पितरों को पिंड करते समय एक पिंड उस शिशु के नाम से भी रखा जाता है ताकि वह भी मोक्ष का अधिकारी हो. कुछ जगहों पर ऐसे बच्चों के लिए तीन दिवसीय श्राद्ध किया जाता है. इस प्रक्रिया के तहत जौ के आटे का पिंड बनाकर विष्णुपद में रखें या किसी अन्य देवालय में उसका ध्यान लगाते हुए रख देना चाहिए.
अलग प्रकार के धार्मिक कर्म
छोटे बच्चे की मृत्यु के बाद पिंडदान और श्राद्ध के विषय में भी परंपराओं में अंतर मिलता है. वयस्क व्यक्ति की मृत्यु के बाद किए जाने वाले सामान्य श्राद्ध-विधान को बहुत छोटे बच्चे पर उसी रूप में लागू करना जरूरी नहीं माना जाता. कुछ परंपराओं में ऐसे बालक के लिए पिंडदान नहीं करने की बात कही गई है, जबकि कुछ विशेष परिस्थितियों में अलग प्रकार के धार्मिक कर्म किए जाते हैं.
इनके लिए क्या है नियम
वहीं किशोरावस्था यानी 12 वर्ष से अधिक उम्र में मृत्यु होने के बाद 10 दिन का सूतक पाठ कर सपिंडीकरण श्राद्ध करना चाहिए और ब्राह्मण भोज आदि करना चाहिए. बता दें कि कृतिका नक्षत्र में ऐसे पूर्वजों के लिए पिंडदान विशेष महत्व रखता है. अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए छोटे बच्चे या कुंवारावस्था में जिनकी मृत्यु हो गई है, उन्हें दोबारा अपने घर में जन्म हो इसके लिए कृतिका नक्षत्र में श्राद्ध किया जाता है.



















