रांची: नंगे पाव..साड़ी पहनकर दौड़ लगाने वाली कविता महतो सुर्खियों में है. सोशल मीडिया पर उनकी कहानी की खूब चर्चा है. कैसे गरीबी और बेबस हालात में जिंदगी को बेहतर बनाने की जद्दोजेहाद में दौड़ लगाने वाली कविता ने खुद अपनी कहानी एक मीडिया को बताई. झारखंड के रामगढ़ जिले की दुलमी प्रखंड की रहने वाली 27 वर्षीया विधवा कविता महतो ने बताया कि हाल ही में हुए होमगार्ड बहाली के ट्रायल में जब अन्य अभ्यर्थी स्पोर्ट्स गियर, ट्रैक सूट और महंगे रनिंग शूज़ में पहुंचे थे. तब मैं कमर में साड़ी कसकर, नंगे पांव और खाली पेट रेतीली जमीन पर नंगे पांव दौड़ पड़ीं. 6 मिनट 40 सेकंड में 1600 मीटर की दौड़ पूरी कर एक्सीलेंट श्रेणी में जगह बनाने वाली कविता की यह तस्वीर सोशल मीडिया पर केवल एक खबर नहीं बल्कि अटूट जज्बे की दास्तान बन चुकी है. जानें उनकी कहानी.
ना ट्रैक सूट का पैसा, ना जूते का सहारा
आमतौर पर 1600 मीटर की एथलेटिक दौड़ के लिए खास तैयारी और खान-पान की जरूरत होती है. लेकिन इंटर तक पढ़ीं कविता के पास ना तो जूते थे. ना ही टी-शर्ट या लूजर (ट्रैक पेंट) खरीदने के पैसे. कविता ने बेहद भावुक होकर अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि फील्ड में सब लड़कियां और महिलाएं मेकअप में थीं. कोई स्पोर्ट्स सूट में थी तो कोई केला, सेब और चना खा रही थी. मेरे पास ना तो ट्रैक सूट के पैसे थे और ना ही जूते के. घर से बिना ब्रश किए और खाली पेट ही निकल गई थी. पैर में टूटी चप्पल देखकर भी शर्म आ रही थी कि लोग क्या कहेंगे. लेकिन मन में बस एक ही डर था कि अगर आज नहीं दौड़ी तो बच्चों को क्या खिलाऊंगी.
बीमारी ने छीना पति, सिर पर 5-6 लाख का कर्ज
कविता का जीवन दुखों और कठोर संघर्षों की भट्टी में तपा है. तीन साल पहले उनके पति दीपक महतो का गुजरात में मजदूरी के दौरान पीलिया और लंबी बीमारी के कारण निधन हो गया. पति को बचाने के लिए कई यूनिट ब्लड चढ़वाना पड़ा. भारी इलाज चला. कर्ज भी बहुत हो चुका था. लेकिन पति नहीं बचे. दर्दनाक बात यह रही कि पति के गुजरने के छह महीने बाद ही उनके छोटे भाई (भैसुर) की भी बीमारी से मौत हो गई. इलाज के दौरान हुआ करीब 5 से 6 लाख रुपये का कर्ज आज भी कविता के सिर पर मंडरा रहा है.
ईंट-भट्ठा, धनरोपनी और सुबह 4 बजे की तपस्या
आज कविता के कंधों पर अपने दो छोटे बच्चों (12 साल का बेटा और 9 साल की बेटी) तथा बीमार एवं वृद्ध सास-ससुर को संभालने का भारी बोझ है. उन्होंने बतलाया कि ससुर बीपी और शुगर के मरीज हैं. जिनका हर महीने दवा का खर्च है. परिवार की रोजी-रोटी चलाने और कर्ज चुकाने के लिए कविता हर वह काम करती हैं जो उन्हें मिलता है. गर्मी के मौसम में ईंट-भट्ठों पर ईंटें ढोना. धान के सीजन में धनरोपनी और कटनी करना. दूसरों के घरों में बर्तन-झाड़ू और मजदूरी करना. एक गाय और बकरी पालकर घर का खर्च चलाना. इन सब के बीच, होमगार्ड की 1600 मीटर दौड़ पास करने के लिए कविता हर दिन तड़के सुबह 4 बजे उठती हैं. अपने दोनों छोटे बच्चों को साथ लेकर गांव के मैदान में नंगे पांव और साड़ी पहनकर प्रैक्टिस करती हैं.
बस घर के पास ड्यूटी मिल जाए
अपनी लाचारी बयां करते हुए कविता कहती हैं कि वे घर छोड़कर कहीं दूर नौकरी नहीं कर सकतीं. क्योंकि सास-ससुर और बच्चों की देखरेख करने वाला कोई दूसरा नहीं है. होमगार्ड बनने की उनकी आखिरी उम्मीद यही है कि उन्हें अपने जिले या ब्लॉक में ड्यूटी मिल जाए. जिससे हर महीने एक तय आमदनी हो सके. स्थानीय ट्रेनर और प्रशासन भी अब उनकी इस हिम्मत को देखकर उनके चयन की उम्मीद जता रहे हैं. अपनी गरीबी और फटेहाल स्थिति को पीछे छोड़ते हुए कविता महतो ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे फौलादी हों. तो पैरों में जूते न होने पर भी मंजिल हासिल की जा सकती है.
कहानी वायरल होने के बाद मिला ट्रैक सूट और जूता
कविता महतो की कहानी जब सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो अंकित रनर एकेडमी के अजय करमाली सहित कई लोग यहां पर पहुंचे हैं. उन्होंने ट्रैक सूट और जूता दिया. 6 मिनट 40 सेकंड में 1600 मीटर की दौड़ पूरी कर एक्सीलेंट श्रेणी में जगह बनाने वाली कविता को काफी सुविधा होगी. अब उनको जूता पहनकर प्रैक्टिस करना होगा. ताकि 24 तारीख से जो दौड़ शुरू उसमें कविता का चयन हो जाए.



















