नैनीताल: उत्तराखंड के पहाड़ों की खूबसूरती हर साल लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती है, लेकिन यही बढ़ता पर्यटन अब हिमालयी शहरों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. नैनीताल और कैंचीधाम जैसे प्रमुख पर्यटन एवं धार्मिक स्थलों पर लगातार बढ़ती भीड़ यानी जरूरत से ज्यादा पर्यटक दबाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. लंबे वीकेंड और छुट्टियों के दौरान नैनीताल की माल रोड, नैनी झील, भोटिया मार्केट, स्नो व्यू और कैंचीधाम में पर्यटकों की भारी भीड़ देखने को मिलती है. सड़कों पर घंटों जाम, पार्किंग की कमी और वाहनों की लंबी कतारें अब यहां की आम तस्वीर बनती जा रही हैं.
पर्यटकों की बढ़ती संख्या का असर सिर्फ ट्रैफिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है. लगातार बढ़ते वाहनों से सड़कों पर दबाव, वायु प्रदूषण, पार्किंग की समस्या और कूड़े का संकट बढ़ रहा है. प्लास्टिक कचरा, जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव और लगातार हो रहा निर्माण हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है. कैंचीधाम में भी श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ यातायात और पार्किंग प्रशासन के लिए चुनौती बनती जा रही है. सवाल यह है कि क्या पर्यटन को बढ़ावा देने की दौड़ में पहाड़ों की भारवहन क्षमता को नजरअंदाज किया जा रहा है.
नैनीताल की भारवहन क्षमता खत्म
नैनीताल में बढ़ते ट्रैफिक और पर्यटकों के दबाव को लेकर इतिहासकार डॉ. अजय रावत ने चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि शहर की मौजूदा स्थिति को देखकर उन्हें दुख होता है. उनके अनुसार, साल 1995 में उन्होंने नैनीताल को लेकर जनहित याचिका दायर की थी. इसमें अदालत ने नैनीताल के बालियानाला और आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में युद्धस्तर पर काम करने के निर्देश दिए थे, लेकिन अपेक्षित स्तर पर काम नहीं हो सका. डॉ. रावत ने बताया कि साल 2006 में एटीआई की ओर से भी यह बताया गया था कि नैनीताल की भारवहन क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है. उन्होंने कहा कि पहले जब नैनीताल में पर्यटकों की संख्या अधिक हो जाती थी तो वाहनों और पर्यटकों को हल्द्वानी में रोकने की व्यवस्था की जाती थी. आज भी ऐसी व्यवस्था लागू करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि नैनीताल के पहाड़ पहले से ही कमजोर हैं. एक तरफ बालियानाला में लगातार भूस्खलन की समस्या बनी हुई है, तो दूसरी ओर राजभवन के पीछे निहाल नाला क्षेत्र भी संवेदनशील है. ऐसे में शहर में नियंत्रित पर्यटन की जरूरत है.
इतनी गाड़ियां पहाड़ों के लिए ठीक नहीं
भूगर्भ विज्ञानी डॉ. भाष्कर पाटनी ने भी नैनीताल और कैंचीधाम में बढ़ते वाहनों के दबाव को चिंताजनक बताया. उन्होंने कहा कि नैनीताल और कैंचीधाम की सड़कें इतनी चौड़ी नहीं हैं कि बड़ी संख्या में वाहनों का लगातार दबाव झेल सकें. उनके मुताबिक, पहाड़ों की इकोलॉजी बेहद संवेदनशील है और इतनी बड़ी संख्या में वाहनों के चलने से सड़क और पहाड़ी ढलानों पर दबाव बढ़ता है. वाहनों से निकलने वाला धुआं पर्यावरण प्रदूषण को भी बढ़ाता है. डॉ. पाटनी ने कहा कि गरमपानी से भवाली तक कई जगह बोल्डर गिरने की घटनाएं सामने आती रहती हैं. हिमालयी क्षेत्र (Fragile Mountains) हैं, इसलिए यहां किसी भी तरह का निर्माण बेहद सोच-समझकर किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि नैनीताल की पहाड़ियां भी बेहद संवेदनशील भूगर्भीय संरचना पर बसी हैं और शहर का बड़ा हिस्सा पहाड़ियों के मलबे पर विकसित हुआ है.
विकास चाहिए, लेकिन पहाड़ की कीमत पर नहीं
नैनीताल और कैंचीधाम में बढ़ता पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. होटल, होमस्टे, टैक्सी, दुकानदार, रेस्तरां और छोटे कारोबारियों की आजीविका पर्यटन से जुड़ी है. लेकिन सवाल यह है कि पर्यटन का मॉडल कैसा हो? अगर पर्यटकों की संख्या बढ़ती रही, लेकिन पार्किंग, ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन, जल व्यवस्था और पहाड़ों की भार वहन क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया तो आने वाले समय में पर्यटन खुद पहाड़ों के लिए संकट बन सकता है. ऐसे में यदि पहाड़ों को बचाना है तो पर्यटन को रोकना नहीं, बल्कि नियंत्रित और टिकाऊ बनाना होगा. समय रहते कैरीइंग कैपेसिटी के आधार पर पर्यटकों और वाहनों की संख्या तय करना, पार्किंग व्यवस्था मजबूत करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करना जरूरी होगा



















