भारत के लोकतंत्र की रक्षा केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाकर दूसरे को नियुक्त करने या हर विवादास्पद चुनावी फैसले को एक अलग राजनीतिक लड़ाई के रूप में चुनौती देने से नहीं हो सकती। विपक्ष को दो परस्पर पूरक सुधारों के लिए अभियान चलाना चाहिए। पहला, मतदाता सूचियों के रखरखाव और अद्यतन की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया जाए, जबकि राष्ट्रीय मानक और निगरानी की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के पास रहे। दूसरा, निर्वाचन आयोग में नियुक्तियों को लेकर केंद्र सरकार के निर्णायक प्रभाव को समाप्त किया जाए। असल सुधार किसी एक अधिकारी को बदलने में नहीं, बल्कि उस संस्थागत व्यवस्था को बदलने में है जो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है…

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) को लेकर चल रहा विरोध गलत मुद्दों पर केंद्रित है। विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार सत्तारूढ़ दल का पक्ष ले रहे हैं, अन्य निर्वाचन आयुक्तों के विचारों की अनदेखी कर रहे हैं और मनमाने ढंग से मतदाता सूची से लोगों के नाम हटा रहे हैं।

इन चिंताओं की जांच की जानी चाहिए। लेकिन विपक्ष का आंदोलन दो बुनियादी समस्याओं से ध्यान भटका रहा है। पहला, भारत का संविधान निर्वाचन आयोग को चुनावों के संबंध में व्यापक एकछत्र अधिकार देता है। दूसरा, निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून शीर्ष अधिकारियों के चयन में केंद्र सरकार को निर्णायक अधिकार प्रदान करता है।

यदि आलोचक वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहते हैं, तो उन्हें एसआईआर और सीईसी को अलग-अलग समस्याओं के रूप में देखने के बजाय निर्वाचन आयोग से संबंधित कानूनों में बुनियादी सुधार की मांग करनी चाहिए। समस्या केवल यह नहीं है कि पद पर कौन बैठा है या किसी विशेष चुनावी प्रक्रिया को किस तरह संचालित किया जा रहा है। असली समस्या संस्थागत ढांचे में है, जो पूरी व्यवस्था को दुरुपयोग के प्रति संवेदनशील बनाता है।

समस्या की शुरुआत निर्वाचन आयोग के एकछत्र नियंत्रण से होती है

संविधान का अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के लिए मतदाता सूचियों पर अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार निर्वाचन आयोग को देता है। इतनी व्यापक शक्तियों का एक ही संस्था में केंद्रीकरण न तो लोकतंत्र के लिए स्वस्थ है और न ही भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए व्यावहारिक।

संयुक्त राज्य अमेरिका इसके विपरीत एक अलग मॉडल प्रस्तुत करता है। वहां राज्य और स्थानीय प्राधिकरण अपने-अपने क्षेत्र के मतदाता पंजीकरण संबंधी रिकॉर्ड का रखरखाव करते हैं और संघीय चुनावों सहित सभी चुनावों का संचालन करते हैं। यह विकेंद्रीकृत व्यवस्था चुनावों के प्रशासन को किसी एक संस्था के हाथों में केंद्रित होने से रोकती है। साथ ही, यह व्यावहारिक वास्तविकता को स्वीकार करती है कि चुनावों का संचालन अंतत: स्थानीय स्तर पर ही होना है और स्थानीय प्राधिकरण इसके लिए अधिक सक्षम स्थिति में होते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिकी राज्य अपनी मनमानी कर सकते हैं। उन्हें संघीय चुनाव कानूनों का पालन करना पड़ता है। इनमें 1965 का वोटिंग राइट्स एक्ट, 1984 का वोटिंग एक्सेसिबिलिटी फॉर दि एल्डरली एंड हैंडीकैप्ड एक्ट और 1993 का नेशनल वोटर रजिस्ट्रेशन एक्ट शामिल हैं। ये कानून मतदान के अधिकारों की रक्षा करते हैं, भेदभाव पर रोक लगाते हैं, मतदाता पंजीकरण और मतदाता पहचान-पत्रों से संबंधित आवश्यकताएं निर्धारित करते हैं तथा मतदान केंद्रों तक पहुंच के लिए सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराते हैं। चुनावी चंदे और अभियान वित्त को नियंत्रित करने के लिए भी अलग कानून हैं।

हाल के वर्षों में अमेरिका में भी मतदाता सूचियां राज्य सरकारों और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के बीच बड़े राजनीतिक टकराव का विषय बनी हैं। मई 2025 से ट्रंप प्रशासन ने राज्यों के मतदाता पंजीकरण रिकॉर्ड तक पहुंच की मांग की है। उसका तर्क है कि संघीय कानून उसे रिकॉर्ड की शुद्धता की जांच के लिए उनका निरीक्षण करने का अधिकार देता है। कई राज्यों ने इसका विरोध किया और केंद्र सरकार के कानूनी अधिकार पर सवाल उठाए। इसके परिणामस्वरूप 30 से अधिक मुकदमे दायर हुए, जिनमें से अधिकांश को अदालतों ने खारिज कर दिया।

भारत के विपक्ष के लिए इससे यह सबक मिलता है कि मतदाता सूची के प्रबंधन को एकमात्र राष्ट्रीय प्राधिकरण के हाथों में रखना जरूरी नहीं है। उसे ऐसे कानून की मांग करनी चाहिए, जिसके तहत मतदाता सूचियों के रखरखाव और उन्हें अद्यतन करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दी जाए, जबकि निर्वाचन आयोग को नियमित और स्वतंत्र ऑडिट कराने का अधिकार प्राप्त हो। ऐसी व्यवस्था अचानक बड़े पैमाने पर और व्यवधान पैदा करने वाले पुनरीक्षण अभियानों की आवश्यकता को कम कर सकती है।

विपक्ष को एसआईआर को लेकर जनता में पैदा हुए असंतोष का इस्तेमाल इस बुनियादी सुधार के लिए दबाव बनाने में करना चाहिए। अन्यथा, एसआईआर को पूरी तरह रोकने की उसकी मांग का ठोस कानूनी आधार कमजोर दिखाई देता है। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण एक वैध जिम्मेदारी है, वास्तविक सवाल यह है कि प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और पर्याप्त सुरक्षा उपायों से युक्त है या नहीं। पुनरीक्षण को पूरी तरह रोकने की मांग उतनी ही मनमानी प्रतीत होती है, जितने मनमाने फैसलों का आरोप विपक्ष ज्ञानेश कुमार पर लगा रहा है।

नियुक्ति संबंधी कानून ने स्थिति को और जटिल बना दिया है

दूसरी बुनियादी समस्या उन अधिकारियों की नियुक्ति से जुड़ी है, जो चुनावों की निगरानी के लिए जिम्मेदार हैं। कई दशकों तक नियुक्ति प्रक्रिया मुख्य रूप से प्रधानमंत्री के नियंत्रण में रही, क्योंकि संसद ने लंबे समय तक कोई ऐसा कानून नहीं बनाया था, जो स्वतंत्र चयन तंत्र निर्धारित करता। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि जब तक संसद ऐसा कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्तियों की सिफारिश प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति द्वारा की जानी चाहिए।

इसके बाद संसद ने एक नया कानून बनाया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री को शामिल किया गया। अब चयन समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। इस प्रकार सरकार के पास समिति के तीन में से दो सदस्यों का समर्थन होता है। यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से हितों के टकराव की स्थिति पैदा करती है। इससे निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को लेकर विश्वास कमजोर होता है, भले ही नियुक्त किया गया कोई अधिकारी व्यक्तिगत रूप से निष्पक्ष तरीके से काम करे।

2023 का यह कानून विपक्ष के कड़े विरोध के बीच पारित हुआ था। सरकार ने राज्यसभा में विधेयक पेश किया, जहां विपक्षी सदस्यों के सदन से बहिर्गमन के बाद इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इसके कुछ दिन बाद लोकसभा ने भी इसे पारित कर दिया। उस समय संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान बड़े पैमाने पर विपक्षी सांसदों के निलंबन के कारण अधिकांश विपक्षी सांसद सदन में मौजूद नहीं थे। उस शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों के कुल 146 विपक्षी सांसद निलंबित किए गए थे।

अब विपक्ष को वास्तव में स्वतंत्र चयन तंत्र की मांग करनी चाहिए, जिसमें सरकार और विपक्ष के प्रतिनिधियों के साथ-साथ न्यायपालिका और अन्य विश्वसनीय संवैधानिक या सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हों। प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और किसी एक राजनीतिक दल को परिणाम तय करने की स्थिति में नहीं होना चाहिए।

केवल पदाधिकारी नहीं, पूरी व्यवस्था में सुधार जरूरी

भारत के लोकतंत्र की रक्षा केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाकर दूसरे को नियुक्त करने या हर विवादास्पद चुनावी फैसले को एक अलग राजनीतिक लड़ाई के रूप में चुनौती देने से नहीं हो सकती। विपक्ष को दो परस्पर पूरक सुधारों के लिए अभियान चलाना चाहिए। पहला, मतदाता सूचियों के रखरखाव और अद्यतन की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया जाए, जबकि राष्ट्रीय मानक और निगरानी की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के पास रहे। दूसरा, निर्वाचन आयोग में नियुक्तियों को लेकर केंद्र सरकार के निर्णायक प्रभाव को समाप्त किया जाए। असल सुधार किसी एक अधिकारी को बदलने में नहीं, बल्कि उस संस्थागत व्यवस्था को बदलने में है जो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है।-भानु धमीजा

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