डिजिटल तकनीक ने व्यक्ति की पहचान का दायरा बढ़ा दिया है। कभी पहचान नाम, पता, जन्मतिथि या किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज विवरण तक सीमित मानी जाती थी। अब मोबाइल नंबर, ई-मेल, बैंक खाता, सोशल मीडिया प्रोफाइल, तस्वीर, आवाज, लोकेशन और इंटरनेट पर गतिविधियां भी हमारी पहचान का हिस्सा बन चुकी हैं। रोजमर्रा के जीवन में डिजिटल माध्यमों पर निर्भरता बढ़ने के साथ हमारी एक समांतर डिजिटल पहचान भी निर्मित हो रही है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं कि डिजिटल पहचान जरूरी है या नहीं, बल्कि यह है कि इस पहचान का मालिक कौन है और उस पर अंतिम अधिकार किसका होना चाहिए। डिजिटल दुनिया हमारे बारे में केवल वही जानकारी दर्ज नहीं करती, जो हम साझा करते हैं। हम कहां जाते हैं, क्या खरीदते हैं, किस तरह की सामग्री देखते हैं, किन लोगों से संवाद करते हैं और किन विषयों पर कितना समय बिताते हैं, ये तमाम सूचनाएं भी डिजिटल प्रोफाइल का हिस्सा बनती जाती हैं।
भारत में आधार और अन्य डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने पहचान के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया को काफी बदला है। सरकारी योजनाओं, बैंकिंग और अनेक सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच आसान हुई है। मगर पहचान जितनी अधिक व्यवस्थाओं से जुड़ती जाती है, उसके दुरुपयोग की स्थिति में जोखिम भी बढ़ता जाता है। इसलिए सुविधा के साथ सुरक्षा और इस्तेमाल की सीमा तय करना भी जरूरी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। पहले किसी व्यक्ति की पहचान चुराने के लिए दस्तावेज, पासवर्ड या किसी खाते तक पहुंच हासिल करना जरूरी माना जाता था। अब तस्वीर, आवाज और वीडियो भी पहचान की नकल करने के साधन बन गए हैं। डीपफेक तकनीक से किसी व्यक्ति के चेहरे और आवाज का इस्तेमाल ऐसी सामग्री तैयार करने में हो सकता है, जिसमें उसने वास्तव में कुछ कहा या किया ही नहीं।
भारत में डीपफेक और एआइ आधारित ठगी के मामले खतरे की गंभीरता दिखाते हैं। अपराधी कभी प्रसिद्ध लोगों के चेहरे और आवाज का इस्तेमाल निवेश योजनाओं के प्रचार के लिए करते हैं, तो कभी नागरिकों की पहचान संबंधी जानकारी का सहारा लेकर डिजिटल खातों और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश करते हैं। पीड़ित को आर्थिक या सामाजिक नुकसान हो जाने के बाद इसका पता चलता है। सोशल मीडिया ने भी इस संकट को एक नया आयाम दिया है। तस्वीरें, यात्राएं, पारिवारिक समारोह, कामकाज और निजी अनुभव साझा करना आज सामाजिक व्यवहार है। इनका भविष्य में किस रूप में इस्तेमाल हो सकता है, इसका अनुमान लोग नहीं लगा पाते। वर्षों पुरानी तस्वीरें और वीडियो किसी दूसरे उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से उन्हें नई सामग्री तैयार करने के लिए आधार बनाया जा सकता है।
यह संकट सिर्फ चर्चित लोगों तक सीमित नहीं है। आम नागरिक भी शिकार हो सकता है। किसी व्यक्ति की पहचान सिर्फ उसकी तस्वीर या नाम नहीं है। उससे जुड़ी प्रतिष्ठा व सामाजिक संबंध उसकी पहचान का हिस्सा हैं। इसलिए इस पहचान की चोरी को केवल डेटा की चोरी मानना पर्याप्त नहीं होगा। डिजिटल पहचान का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ‘एल्गोरिद्म’ से जुड़ा है। मशीनें किसी व्यक्ति के व्यवहार, रुचियों और गतिविधियों के आधार पर उसके बारे में प्रोफाइल तैयार करती हैं। इन निष्कर्षों का असर विज्ञापनों से लेकर ऋण, बीमा, रोजगार और दूसरी सेवाओं तक पड़ सकता है। समस्या तब पैदा होती है, जब मशीन द्वारा निकाला गया अनुमान सत्य मान लिया जाए। मशीन का निष्कर्ष गलत हो सकता है। इसलिए यदि किसी डिजिटल आकलन के आधार पर किसी को कोई अवसर, सुविधा या सेवा नहीं मिलती, तो उसे उस निर्णय को जानने, चुनौती देने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अधिकार होना चाहिए। यहां डेटा और पहचान के बीच अंतर को समझना जरूरी है। किसी व्यक्ति का नाम, मोबाइल नंबर या ई-मेल एक सूचना हो सकती है, लेकिन जब ऐसी अनेक सूचनाओं को जोड़ा जाता है तो उनसे बनी प्रोफाइल व्यक्ति के बारे में अधिक जानकारी देती है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सा डेटा लिया जा रहा है। यह पूछना चाहिए कि वह क्यों लिया जा रहा है, कितने समय तक सुरक्षित रखा जाएगा, किसके साथ साझा किया जाएगा।
भारत में निजी डेटा की सुरक्षा के लिए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 एक महत्त्वपूर्ण पहल है। मगर कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है। उसकी निगरानी, स्पष्ट जवाबदेही व आसान शिकायत-निवारण व्यवस्था भी जरूरी है। आम उपयोगकर्ता के लिए यह जानना आसान नहीं कि कोई एप या वेबसाइट उसके बारे में कौन-कौन-सी सूचनाएं जुटा रही है और उनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से कर रही हैं। लंबी और जटिल शर्तों के बीच ‘सहमति’ का बटन दबा देना वास्तविक सहमति नहीं कहा जा सकता। सहमति तभी सार्थक होगी, जब व्यक्ति को सरल भाषा में बताया जाए कि उसकी कौन-सी जानकारी क्यों ली जा रही है, और उसका इस्तेमाल कहां होगा। डिजिटल पहचान की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार, कंपनियों और नागरिकों—तीनों की है। उपयोगकर्ताओं को भी अनावश्यक निजी जानकारी साझा करने से बचना चाहिए और संदिग्ध संदेशों, फोन तथा डिजिटल सामग्री के प्रति सावधान रहना चाहिए। सारी जिम्मेदारी नागरिक पर डाल देना उचित नहीं होगा।
जिस तरह सड़क सुरक्षा केवल वाहन चालक की जिम्मेदारी नहीं होती, उसी तरह डिजिटल सुरक्षा भी केवल उपयोगकर्ता की सतर्कता पर निर्भर नहीं रह सकती। डिजिटल मंचों और सेवाप्रदाताओं को भी ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें गोपनीयता और सुरक्षा, डिफॉल्ट रूप से सुनिश्चित हो। एआइ के बढ़ते इस्तेमाल के साथ यह चुनौती और गंभीर होने वाली है। आज नकली वीडियो की पहचान कठिन है, कल असली और कृत्रिम आवाज के बीच अंतर करना भी आम व्यक्ति के लिए आसान नहीं रहेगा। ऐसे में इंटरनेट पर दिखाई देने वाली हर तस्वीर, सुनाई देने वाली हर आवाज और प्रसारित होने वाली हर सूचना को सच मानना खतरनाक होगा। डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल तकनीकी उपकरण चलाना नहीं, बल्कि सूचना के स्रोत, विश्वसनीयता और उसके संभावित दुरुपयोग को समझना भी होना चाहिए।
जरूरी बात यह है कि डिजिटल पहचान को महज तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार के रूप में देखा जाए। सरकार पहचान का प्रमाणीकरण कर सकती है, कंपनियां सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए जानकारी ले सकती हैं और एआइ उस जानकारी का विश्लेषण कर सकती है, लेकिन इनमें से किसी को व्यक्ति की पहचान पर मालिकाना अधिकार नहीं मिल सकता। व्यक्ति की तस्वीर, आवाज, नाम और उससे जुड़ी छवि उसके व्यक्तित्व और गरिमा से जुड़ी है। इसलिए डिजिटल भविष्य का रास्ता केवल अधिक तकनीक से नहीं, बल्कि अधिक अधिकार-बोध और जवाबदेही से तय होगा। तकनीक मनुष्य की सुविधा के लिए है, मनुष्य की पहचान पर नियंत्रण के लिए नहीं। डिजिटल दुनिया में आगे बढ़ते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी पहचान हमारी सहमति के बिना किसी और की संपत्ति न बन जाए।



















