नई दिल्लीः जन्मशताण्डब्दी महोत्सव के दलनायक डॉ चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि वर्ष 2026 अखिल विश्व गायत्री परिवार के लिए केवल उत्सव का वर्ष नहीं, बल्कि सौ वर्षों की साधना, त्याग और समर्पण का ऐतिहासिक पड़ाव है। यह परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा के जन्म, अखंड दीप के प्रज्वलन और युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की साधना के सौ वर्षों का पावन अवसर है। इन तीनों की प्रेरणा से जन्मशताब्दी महोत्सव समाज में नई चेतना जगाने और युग निर्माण के संकल्पों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन रहा है।
उन्होंने बताया कि इस ऐतिहासिक वर्ष का प्रथम चरण हरिद्वार में गंगा की दो धाराओं के बीच स्थित वैरागी द्वीप पर संपन्न हुआ। श्रद्धा, साधना और जनउत्साह से भरे इस आयोजन ने लाखों गायत्री परिजनों में नई ऊर्जा का संचार किया। अब इसी आध्यात्मिक चेतना को आगे बढ़ाते हुए 31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में महोत्सव का द्वितीय चरण आयोजित होने जा रहा है।
दलनायक ने कहा कि इस आयोजन की विशेषता केवल इसकी भव्यता नहीं, बल्कि इसके व्यापक उद्देश्य हैं। वर्ष के प्रारंभ में लिए गए व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और राष्ट्र निर्माण के संकल्पों की समीक्षा तथा भविष्य की कार्ययोजना पर विचार इस महोत्सव का महत्वपूर्ण आधार है। देशभर से 24 हजार चयनित प्रतिभागियों को आमंत्रित करने की योजना है। इनमें विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों के साथ दस हजार से अधिक युवाओं की सहभागिता अपेक्षित है। यह आयोजन अनुभवी पीढ़ी और युवा शक्ति के बीच संवाद का अवसर भी बनेगा।
डॉ चिन्मय पण्ड्या ने बताया कि महोत्सव में शासन, प्रशासन, शिक्षा, सामाजिक सेवा और आध्यात्मिक जगत की प्रमुख विभूतियों को आमंत्रित किया गया है। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु, लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला, केंद्रीय मंत्रियों, राज्यपालों तथा अन्य गणमान्यजनों की प्रस्तावित सहभागिता इसे विशेष महत्व देती है। आयोजन की मूल भावना राजतंत्र की व्यवस्था शक्ति और धर्मतंत्र की नैतिक चेतना को लोकमंगल के लिए एक साथ लाना है।
उन्होंने बताया कि महोत्सव का पहला दिन मातृशक्ति और नारी जागरण को समर्पित होगा। परम वंदनीया माताजी के जीवन, उनके त्याग और महिला सशक्तीकरण के योगदान पर चिंतन होगा। विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाली महिलाओं को सम्मानित करने की योजना है। माताजी की जन्मशताब्दी पर स्मारक डाक टिकट और सिक्के का प्रस्तावित विमोचन भी इस अवसर को ऐतिहासिक महत्व प्रदान करेगा। दूसरा दिन श्वसुधैव कुटुम्बकम्श् और विश्व बंधुत्व की भावना को समर्पित होगा। इसमें अंतरराष्ट्रीय सहभागिता, सांस्कृतिक एकता और मानवता के साझा भविष्य पर विशेष बल दिया जाएगा।
सामूहिक दीपयज्ञ के माध्यम से विश्व शांति, सद्भाव और राष्ट्र निर्माण के संकल्प व्यक्त किए जाएँगे। तीसरा दिन युग निर्माण के महासंकल्प का होगा। इसमें पहले से चल रहे अभियानों की प्रगति, भविष्य की जिम्मेदारियों और समाज में रचनात्मक परिवर्तन की योजनाओं पर विचार किया जाएगा। उद्देश्य यही है कि समारोह में लिए गए संकल्प केवल घोषणाएँ न रहें, बल्कि जनजीवन में दिखाई देने वाले सकारात्मक बदलाव का आधार बनें।
उन्होंने बताया कि युगऋषि ने समाज परिवर्तन के लिए शासन और अध्यात्म के सकारात्मक समन्वय को आवश्यक माना था। दिल्ली का यह आयोजन उसी विचार को नई दिशा देने का प्रयास है। इसके बाद नवंबर में हरिद्वार में प्रस्तावित चिंतन कार्यक्रमों के माध्यम से भविष्य की योजनाओं को और विस्तार देने की तैयारी है। उन्होंने बताया कि जन्मशताब्दी महोत्सव का वास्तविक संदेश यही है कि सौ वर्षों से प्रज्वलित आध्यात्मिक ज्योति अब समाज परिवर्तन की व्यापक चेतना बने। जब साधना सेवा से, युवा शक्ति अनुभव से और शासन नैतिक मूल्यों से जुड़ेगा, तभी व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का संकल्प साकार होगा। यही इस ऐतिहासिक महोत्सव की सार्थकता और आने वाली पीढ़ियों के लिए उसका सबसे बड़ा संदेश है।



















